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सुन्दर

sundar

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    अर्थ प्राण थिक शब्द के, राष्ट्र प्राण थिक तंत्र

    कर्म प्राण थिक जीव के, इएह धर्म के मंत्र

    तंत्र यदि नहि कऽ सकैत अछि राष्ट्रीयताक परवाहि

    एहन तंत्र के सभ मीलि कऽ, भल थीक दी डाहि॥

    दूर-दूर आकाशक सीमा, दृष्टि साध्य भरि छूबऽ चाहय

    उदयाचल अस्ताचल रवि, थिक समान ने बूझऽ चाहय

    उदयाचलक प्रभाकर, आभा रंग-बिरंगक लाबय

    अस्ताचल के पीअर सन छवि, अंग-अंग झरकाबय॥

    केओ कहैए स्वर्ग अप्सरा सभसँ सुन्दर

    केओ कहैए पारिजात लग, ककर मोजर?

    पूर्णिमा के चान सुखद सुन्दर लगैत अछि

    धरि, सुन्दरतहु के सुन्दर तँ आँखिअहि कहैत अछि॥

    ऋतु वसन्त के मलयानिल वा प्रातः कालक पूब

    अरुणिम नभ, सन्ध्या बेला वा फूलल कमलक फूल

    कोविद मन कर सुन्दरता परिभाषित एकहि

    किछुटा नहि अछि सुन्दर जावत आँखि कहय नहि॥

    आँखिअहि जोखय सुन्दरता, जीवन बटिखारा

    जीवन जे नहि बना सकय, से मृतकक सारा॥

    जे जीवन के महमह कऽ दए, सएह अप्सरा

    पारिजात जे सदिखन प्रमुदए देश के धरा

    जे अन्हार के चीरि, दैत छथि अवश-विवश मे जान

    अमिय थिका देश-समाजक, उएह पूनमक चान॥

    भ्रष्टाचारी फुला रहल अछि, से वसन्त कि करबे?

    दुराचारटा व्यापय चौदिसि, बिनु'मलयानिल' रहबे

    थोड़हु बरखा बन्न होअय नहि, घरक ठाठरि चूब

    गोड़ लगै छी, जाउ कतहु हे! सन्ध्याकालक पूब॥

    देश दैन्य के मारि भगाबय, से अरुणिम नभ-सन्ध्या

    'कमलफूल' जे देश वंश हित, माय तकर नहि बन्ध्या

    कोविद मन कर सुन्दरता परिभाषित एकहि

    नगर कोनहु नहि सुन्दर जा नागर कहथि नहि॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 58)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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