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क़ब्रिस्तान की एक ग्रीष्म-संध्या

qabristan ki ek greeshm sandhya

अनुवाद : यतेन्द्र कुमार

पर्सी बिश शेली

पर्सी बिश शेली

क़ब्रिस्तान की एक ग्रीष्म-संध्या

पर्सी बिश शेली

और अधिकपर्सी बिश शेली

    (1)

    पोंछ ले गया विस्तृत नभमंडल से पवन वाष्प का हर कन,

    जिससे ढकी हुई थी अब तक अस्त सूर्य की किरन सुगहली।

    धूमिलतर उल कुंतल-दल से, अपनी किरन अलक का ग्रंथन,

    दिन के मलिन नयन के चारों ओर कर रही संध्या पीली।

    मौन, और संध्या-प्रकाश, जो हैं अप्रिय मानव को लगते,

    उस अस्पष्ट सामने की घाटी में हो कर-बद्ध सरकते।

    (2)

    मुँदे दिवस की ओर छोड़ते अपनी सुषमाएँ वे जिनसे,

    भर-भर डाले, वसुंधरा नक्षत्र, पवन औ' सरिता सागर।

    ध्वनि, प्रवाह औ' उजियाला देते अपने समर्थ कंपन से,

    इस रहस्य से भरे हुए जादू का ही अभिनंदन-उत्तर!

    रुके पवन, या जब चलते हैं, तो उनके वे स्पंदन कोमल,

    नहीं जान पाती है किंचित चर्च-शिखर की शुष्क तृणावलि।

    (3)

    अग्नि-राशि! तेरे इन शिखर नुकीलों से है वेदी बनती,

    ऐसा लगता जैसे अग्नि-पिरामिड उठे हुए हों, नभ पर।

    तू भी उसके मधु गंभीर रहस्यों का चुप होकर करती,

    आज्ञा पालन, धूमिल दूर शिखर पर स्वर्गिक वर्ण सजाकर।

    जिनके उच्चस्तल के, जो हैं क्षयशः, और दृगों से ओझल,

    होते हैं संकुलित चतुर्दिक,नक्षत्रों में निशि के बादल।

    (4)

    मृत्तक मनुष्य सो रहे हैं अपनी समाधियों के ही भीतर,

    और एक रोमांचमयी ध्वनि करते जब वे क्षयशः शायित।

    अर्द्धचेतना, अर्द्धभावना, तम में उठती स्पंदित होकर,

    प्राणित वस्तु चतुर्दिक उनकी कीटमयी सेजों से श्वासित।

    और शांत निशि, मूक निलय के संग, जिसे वे करते हैं लय,

    जिसके दुखमय सरसर स्पंदन का अनुभव होता अश्रव्यमय।

    (5)

    मृत्यु इस तरह अनुष्ठान से पावन और नरम हो होकर,

    नम्र और भयमुक्त बनी है, इस प्रशांतमय निशि सदृश ही।

    आशा करता मैं जिज्ञासु बाल सा क्रीड़ा कर समाधि पर,

    कहीं मृत्यु बिलकुल ओझल कर पाती, मानव-दृग पथ से ही—

    मधुर रहस्यों की, अथवा उच्छ्वासहीन निद्रा के भीतर,

    वे मृदुतम सपने, अविरत अशयन ने रक्खा जिन्हें सँजोकर।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शेली
    • संपादक : यतेन्द्र कुमार
    • रचनाकार : पर्सी बिश शेली
    • प्रकाशन : भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ़

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