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चाबियों की रखवाली

chabiyon ki rakhvali

निकोलाई रेरिख

निकोलाई रेरिख

चाबियों की रखवाली

निकोलाई रेरिख

और अधिकनिकोलाई रेरिख

    आज मैं बनूँगा जादूगर,

    अपनी असफलताओं को

    बदल डालूँगा सफलताओं में।

    मौन धारण कर रखा था जिन लोगों ने

    वे बातें करने लगे हैं।

    पीछे मुड़ने लगे हैं

    जिन्हें आगे जाना था।

    डर गए डरावने लोग,

    धमकियाँ देने वाले गिड़गिड़ाने लगे।

    फ़ाख़्ताओं की तरह विचार आए

    और रुक गए संसार पर शासन करने के लिए।

    सबसे अधिक शांत थे जो शब्द

    तूफ़ानों को लेते आए अपने साथ।

    और तुम चलते रहे उसकी छाया की तरह

    जिसे अभी अस्तित्व में आना था।

    तुम अब एक बच्चे का रूप धारण करोगे

    ताकि बाधा पहुँचाए तुम्हें किसी तरह की लज्जा।

    तुम बैठे रहे बाहर की देहरी पर

    जिस तक पहुँच सकते थे हर तरह के ठग।

    तुम पूछते थे—कौन ठगना चाहता है मुझे?

    इसमें हैरानी की क्या बात?

    सफल शिकारी ढूँढ़ लेगा

    अपना शिकार

    बिना डरे।

    पर सफलता प्राप्त कर

    यहाँ से जाते हुए मैं जानता हूँ

    तुमसे से हर एक से मैं मिल नहीं पाया हूँ

    अधूरी रह गई हैं अच्छी मुलाक़ातें।

    बहुत से भले लोग जा चुके हैं

    या अभी तक यहाँ पहुँचे नहीं।

    मैं उन्हें जानता नहीं था।

    मैं नए-नए वस्त्र पहनकर

    बैठा रहा तुम्हारे बीच।

    तुम भी धारण करते रहे परिधान तरह-तरह के

    और चुपचाप रखवाली करते रहे

    द्वारों की जंग लगी

    चाबियों की।

    स्रोत :
    • पुस्तक : निकोलाई रेरिख की कविताएँ (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : निकोलाई रेरिख
    • प्रकाशन : रेरिख अध्ययन परिषद, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1995

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