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सृजनक दीप जरबैत

srijnak deep jarbait

दीपिका चन्द्रा

दीपिका चन्द्रा

सृजनक दीप जरबैत

दीपिका चन्द्रा

और अधिकदीपिका चन्द्रा

    आइ जखन

    वैश्वीकरणक बिहाड़िमे

    लोप भऽ रहल अछि

    हमर सभ्यता संस्कृति

    हमर गाम समाजक लोक

    सभ किछु बिसरने

    बढ़ल जा रहल अछि

    एकटा एहेन सन

    अनिश्चितता दिस

    जतय शेष नहि रहत

    कोनो मानवीय संवेदना

    बजारक मकड़जालमे

    आँखिपर तथाकथित विकासक

    रंगबिरही चश्मा पहिरने

    दौगल जा रहल अछि मनुक्ख

    घुप्प अन्हार दिस

    तखन हम कोना रही चुप्प

    अपन माटि-पानि पर

    पसरैत एहि अन्हरियाक विरुद्ध

    रोशनाइ रूपी तेल

    आखर रूपी टेमी लेने

    सृजनक दीप जरबैत छी

    स्रोत :
    • पुस्तक : चौकठिसँ चान दिस (पृष्ठ 13)
    • रचनाकार : दीपिका चन्द्रा
    • प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
    • संस्करण : 2024

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