सिनुरिया बिहुँसैत भोर ऐ' हमर कविता
sinuriya bihunsait bhor ai hamar kavita
...आ आरत भ' कखनो
दौगै-ए हमर कविता
गामक कोनो चौपाड़ि
आ कि मुखियाजीक कचहरी
आ ऐ सभठाम स' मुँहठाह भ'
फेर सरकारी कचहरी के कठघरा मे
ठाढ़ होइए फरियादी बनि।
आ ओहूठाम स' निराश भ'
हतासी के छँटैत इनकिलाबी बनि
निकलि पड़ैए हमर कविता
नै कोनो असाहनि-पसाहनि नै
कोनो गहना-गुड़िया नै
भल पीया हेता
त' गुदरिये लोभेता
उर्मिला बनि कहैए हमर कविता
जुनि ताकू कि केना कहैए
एना कहैए कि ओना कहैए
कात' स' ठाढ़' भ' कहैए
एत' स' कहैए कि ओत' स' कहैए
खाली अहाँ तकियौ
जे की कहैए हमर कविता
दिशाहीन अधिसंख्यक शोर नै
प्रतिक्रियावादी जमातोक जोर नै
गोङ बनल समूहक
खूगल ठोर ऐ' हमर कविता
युग-युग स' ठकाइत समाजक अति जरूरी फाँटक
सिनुरिया बिहुंसैत
भोर ऐ' हमर कविता
- पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 9)
- रचनाकार : राज
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
- संस्करण : 2011
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