शतरंज के मोहरे

सुधा अरोड़ा

शतरंज के मोहरे

सुधा अरोड़ा

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    सबसे सफल

    वह अकेली औरत है

    जो अकेली कभी हुई ही नहीं

    फिर भी अकेली कहलाती है।

    अकेले होने के छत्र तले पनप रही है

    नई सदी में यह नई जमात

    जो सन्नाटे का संगीत नहीं सुनती

    सलाइयों में यादों के फंदे नहीं बुनती

    करेले और भिंडी में नहीं उलझती

    अपने को बंद दराज़ में नहीं छोड़ती

    अपने सारे चेहरे साथ लिए चलती है

    कौन जाने, कब किसकी ज़रूरत पड़ जाए।

    अकेलेपन की ढाल थामे

    इठलाती-इतराती

    टेढ़ी मुस्कान बिखेरती चलती है

    अपनी शतरंज पर

    पिटे हुए मोहरों से खेलती है।

    एक-एक का शिकार करती

    उठापटक करती

    उन्हें ध्वस्त होते देखती है।

    उसकी शतरंज का खेल है न्यारा

    राजा धुना जाता है

    और जीतता है प्यादा!

    उसकी उँगलियों पर धागे बँधे हैं,

    हर उँगली पर है एक चेहरा

    एक से एक नायाब

    एक से एक शानदार!

    उसके इंगित पर मोहित है

    वह पूरी की पूरी जमात

    जिसने

    अपने अपने घर की औरत की

    छीनी थी कायनात...

    उन सारे महापुरुषों को

    अपने ठेंगे पर रखती

    एक विजेता की मुस्कान के साथ

    सड़क के दोनों किनारों पर

    फेंकती चलती है वह औरत

    यह एहसास करवाए बिना

    कि वे फेंके जा रहे हैं!

    उन्हें बिलबिलाते-रिरियाते देखती है

    और बाईं भ्रू को तिरछा कर

    आगे बढ़ लेती है

    और वे ही उसे सिर माथे बिठाते हैं

    जिन्हें वह कुचलती चलती है!

    इक्कीसवीं सदी की यह औरत

    हाड़-मांस की नहीं रह जाती

    इस्पात में ढल जाती है

    और समाज का

    सदियों पुराना

    शोषण का इतिहास बदल डालती है।

    रौंदती है उन्हें

    जिनकी बपौती थी इस खेल पर

    उन्हें लट्टू-सा हथेली पर घुमाती है

    और ज़मीन पर चक्कर खाता छोड़

    बंद होंठों से तिरछा मुस्काती है।

    तुर्रा यह कि फिर भी

    अकेली औरत की कलगी

    अपने सिर माथे सजाए

    अकेले होने का

    अपना ओहदा

    बरक़रार रखती है।

    दो क़दम आगे बढ़ती

    आधी आबादी को

    चार क़दम पीछे धकेलती

    बाज़ार के साथ

    बाज़ार बनती

    यह सबसे ख़तरनाक़ औरत है!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुधा अरोड़ा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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