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शस्य-गान

shasya gaan

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    स्वागत हे शरत-राजलक्ष्मीक सुफल-दान

    आँगनमे हमर सुआपंखी गमकैत धान

    रंग देखि हरियर चिर शीतल भऽ गेल आँखि

    कल्पना-विहंगम केर चपल-सजग भेल पाँखि

    कण्ठ खुजल भारतीक, मऽन पड़ल साम-गान

    आँगनमे हमर सुआपंखी गमकैत धान

    खेतहिसँ लाओल हम पाहुनकेँ अरिआइत

    पूजा-सत्कार करऽ वेआकुल अगुताइत

    बाजि उठल शंख आइ मंगल ध्वनि शुभ बिहान

    स्वागत हे शरत-राजलक्ष्मीक सुफल-दान

    गोबरसँ गायक हम नीपल आँगन-दुआरि

    राखल हम अगितहिसँ घर, परिसर, पथ बुहारि

    देवालय बनल गाय-महिषक बाड़ा-बथान।

    आँगनमे हमर सुआपंखी गमकैत धान

    रूप अन्नपूर्णाक सदानन्द सदा-बहार

    लाल-लाल पालकी, हजार-पाँच सय कहार।

    नाचि उठल मनक मयूर, जुड़ा गेल प्राण

    स्वागत हे शरत-राजलक्ष्मीक सुफल-दान

    आसन हम कोन दिअऽ? राखू हम कोन ठाम?

    हलचलमे बिसरि गेलहुँ, अपनो हम नाम गाम।

    कंगना झनकैत चपल चुड़ी पर गेल कान

    आँगनमे हमर सुआपंखी गमकैत धान

    ठुमुक ठुमुक छथि खंजन-चालि चलै चिरंजीव

    खिड़कीसँ झाँकै छथि बहुआसिन उद्ग्रीव

    टूटि गेल बाबा केर निर्गुण समाधि-ध्यान

    स्वागत हे शरत-राजलक्ष्मीक, सुफल-दान

    आबि गेल वर्षा धान काटिते कि हाँसु हाथ

    मन पड़ल सोन-तरी, मऽन कवि रवीन्द्र नाथ

    दृष्टिएँ कतेक दूर, भाव सृष्टिएँ समान

    आँगनमे हमर सुआपंखी गमकैत धान

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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