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शान्तिक रक्षा

shantik raksha

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

शान्तिक रक्षा

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    इतिहासक पन्नापर देखू ढबकि गेल अछि मोसि,

    तन्द्रा तोड़क हेतु लोककेँ चाही अखरा नोसि।

    पुरिबा-पछबा हूँकि रहल छै उड़ल फिरै अछि पात,

    तदपि कल्पना-क्षितिज कोरमे हँसइछ स्वर्णिम प्रात।

    बुझले अछि पहिनेसँ दम्भी-मानव मनक दुराशा,

    कहि गेलाह कविवर कबीर 'जग पानिक तितल बतासा'।

    द्वेषक धार अहंकेर नौका, लोभे अछि करुआरि,

    स्वार्थक घूर्णिचक्रपर घुमइतकेँ के सकत उबारि?

    गगन पारमे पसरि रहल अछि विकट तिमिरकेर जाल,

    विज्ञानक बीहरिमे बैसल विध्वंसक व्याल।

    धर्म-दीपमे श्रद्धा-सिञ्चित रहल सत्यक टेमी,

    मनुज-लोकमे बाँचि सकत नहि आब मनुजता प्रेमी।

    विश्वासक बस्ता फोलब तँ भेटत कपट-प्रबन्ध,

    आत्मतत्त्व दर्शनक दृष्टिसँ मनुज भेल अछि अन्ध।

    रखलनि विष्णु सुदर्शन, ब्रह्मा लेलनि नुका कमण्डल,

    रुद्रक डमरू-नाद-निनादित रहत सकल ग्रहमण्डल।

    बीतल सरस-वसन्त उषम-ग्रीषम अछि सम्मुख ठाढ़,

    देखि रहल छी युगक पीठपर महाभयंकर दाढ़।

    शशधर बनि विषधर विचरै अछि चाही रहक सचेत,

    मारल जायत शान्ति अन्यथा मङनी अपटी खेत।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 345)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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