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शब्द का प्रकाश

shabd ka parkash

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

व्लादीमीर पोपोविच

व्लादीमीर पोपोविच

शब्द का प्रकाश

व्लादीमीर पोपोविच

और अधिकव्लादीमीर पोपोविच

    1

    कौन कह सकता था कि शब्द उठा सकता है

    जीव को मृत्यु से, कि मृत्यु ले जाती मृत्यु में,

    कि शब्द से निकलेगा सशक्त जीव।

    वह शब्द जानते हैं हम, आज भी ध्वनित है

    और कब का चुप है। कैसा बढ़ आया

    बल के तेजपत्र में, सितारों में, पंखों में!

    जन्मा इसीलिए कि उद्घोषित हो सके

    —बढ़ा वह जन के साथ, बढ़ा धरती के साथ।

    2

    जानता मैं निरपराध है बल अथवा दोषी

    जो कितनी वस्तुएँ फेंक चुका विस्मृति में?

    क्यों ऐसा घटता प्रायः जीवन में

    कि मृतक बन जाते वे जो प्रियतम हैं?

    हैं ऐसे जीव भी भेजता जीवन जिनकोः

    अतीत के नहीं जो—चिर-स्थायी,

    और जितने दूर हम उनसे जीवन में,

    अधिक जीवंत जीते वे अधिक दमकते।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 91)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : व्लादीमीर पोपोविच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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