सितंबर, 11 : एक चिड़ा और एक चिड़ी की कहानी
September 11
एक था चिड़ा और एक भी चिड़ी—
एक नीम के दरख़्त पर उनका था घोंसला
बड़ा गहरा प्रेम था दोनों में
दोनों साथ घोंसले से निकलते
साथ चारा चुगते
या कभी-कभी चारे की कमी होने पर
अलग-अलग भी उड़ जाते
और शाम को जब घोंसले में लौटते
तो तरह-तरह से एक-दूसरे को ख़ूब प्यार करते
फिर घोंसले में साथ सो जाते
एक दिन आया—
शाम को चिड़ी लौटकर नहीं आई
चिड़ा बहुत व्याकुल हुआ
कभी अंदर जाकर खोजे
कभी बैठकर चारों ओर देखे
कभी उड़ के एक तरफ़
कभी दूसरी तरफ़
चक्कर काट के लौट आवे
अँधेरा बढ़ता जा रहा था
निराश होकर घोंसले में बैठ गया
शरीर और मन दोनों से थक गया था
उस रात चिड़े को नींद नहीं आई
उस दिन तो उसने चारा भी न चुगा
और बराबर कुछ बोलता रहा
जैसे चिड़ी को पुकार रहा हो
दिन भर ऐसा ही बीता
घोंसला उसको सूना लगे
इसलिए वहाँ ज़्यादा देर रुक न सके
फिर अँधेरे ने उसे अंदर रहने को मजबूर किया
दूसरी भोर हुई
फिर चिड़ी की वैसी ही तलाश
वैसे ही बार-बार पुकारना
एक बार जब घोंसले के द्वार पर बैठा था
तो एक नई चिड़ी उसके पास आकर बैठ गई
और फुदकने लगी
चिड़े ने उसे मार कर भगा दिया
फिर कुछ देर बाद चिड़ा उड़ गया
और उड़ता ही चला गया...
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