जगकेँ युग परतारि रहल अछि
jagken yug partari rahal achhi
चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
Chandranath Mishra 'Amar'
जगकेँ युग परतारि रहल अछि
jagken yug partari rahal achhi
Chandranath Mishra 'Amar'
चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
जगकेँ युग परतारि रहल अछि।
एमहर-ओमहर के तकैत अछि, अपने हाथ सुतारि रहल अछि।
उठत नियन्त्रण भारतवर्षक
सुनलक बात जखन ई हर्षक,
बनिञा आ टुटपुजिया नेता, सब कोठी अजबाड़ि रहल अछि।
पकड़ि बेङकेँ आइ फतिंगा
सहजहिँ लाभ कराबय गंगा,
बनबिलाड़केँ रंगमंचपर, मुसरी धरि ललकारि रहल अछि।
बहुतो गप्प करय नित मारक,
बहुत विचारय काज सम्हारक,
बैसल विसुन-बिलाड़ि बहुत जन, सबतरि आगि पसारि रहल अछि।
बहुतो जन व्यापारी बनला,
बहुतो खद्धड़धारी बनला,
पत्रकार बनि बहुतो कवि आ लेखककेँ टिटकारि रहल अछि।
सुरा औषधिक हेतु ग्राह्य अछि,
आजुक युगमे धर्म बाह्य अछि,
धयने मुहड़ा अनुपम मुखड़ा, निर्भय बोतल ढारि रहल अछि।
मालिक हाथी अपन गमौलक,
महथवार अधिकार जमौलक,
बगड़ा झपटल बाजक ऊपर पदसँ पकड़ि उतारि रहल अछि।
- पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 308)
- संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
- रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2025
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