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सन्नाटा

sannata

कुमार विक्रमादित्य

और अधिककुमार विक्रमादित्य

    वसंत के आगमन से पहले

    हर बार सोचता है

    एक आदमी

    जिसका घर का ठिकाना

    अपने आप का पता

    कि इस बार पूस की रात मे

    बना लूँगा एक रजाई

    अपनी लुगाई के लिए

    जिसने आज तक खैरात में मिले

    कम्बल में ही रात काटे हैं

    जो उसे प्रत्येक वर्ष

    मिल जाते हैं किसी किसी

    चुनाव के बहाने,

    दिन भर की थकन के बाद

    कम्बल सुकून देता कि नहीं

    यह उसे पता नहीं

    लेकिन भिनसरवा की पुरवैया में

    चुभते हैं कम्बल के वो सूत

    जो किसी चुनाव के माफ़िक ही

    जनता की चुनी सरकार के नुमाइंदे

    अक्सर देते रहते हैं

    अपनी भोली भाली जनता को,

    अगर उन्हें चाहिए सड़क

    तो उन्हें मिलता है पगडंडी

    अगर उन्हें चाहिए दवाई

    तो उन्हें मिलता है

    डुप्लीकेट दवाई

    जो पैसे के बल पर

    बाज़ार में खपाए जाते हैं

    अगर उन्हें चाहिए घर

    तो उन्हें मिलता है

    तीन नंबर वाले ईंट से बने घर

    जो दूसरे सावन की मार

    नहीं झेल सकता,

    अगर उन्हें चाहिए शिक्षा

    तो उन्हें मिलती है

    चबूतरा पर चल रहा विद्यालय

    जहाँ शिक्षा के अलावा

    सभी काम करवाए जाते हैं

    धौंस दिखाकर

    सरकारी फ़रमान के नाम पर,

    अगर उन्हें चाहिए रोजगार

    तो उन्हें मिलते हैं

    हज़ार दो हज़ार और पाँच हज़ार की नौकरी

    और खोल देते हैं सरकरी खज़ाना

    लूटने के लिए

    उन ग़रीब मजलूम लोगों के पैसे

    जो देते हैं सरकार को टैक्स

    बिना किसी जोर घटाव के,

    कहते हैं सिस्टम चलने के लिए

    ऐसा करना पड़ता है

    और सरकारी नौकर लूटता है

    भोली-भली जनता को और

    पहुँचाता है पैसे समय सरकार को

    जिसमें सभी का प्रतिशत फिक्स है

    बस काग़ज़ पर काम दिखना चाहिए।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुमार विक्रमादित्य
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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