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संक्रमण के साथ-साथ

sankrman ke saath saath

सत्यव्रत रजक

सत्यव्रत रजक

संक्रमण के साथ-साथ

सत्यव्रत रजक

और अधिकसत्यव्रत रजक

    एक दीवार को दस तरीकों से देखकर हम थक जाते थे

    एक रंग को और किस रंग से देखते

    रोज एक कोमल बिल्ली हमारे भीतर ऊँघती थी और पूछती थी

    बहुत अधिक योजनाओं और बहुत सतही अभिलाषाओं में गिरकर जो भी मिला

    पर इस मृत्युपरक दूब में बार-बार पानी देकर क्या मिला

    सूखे गुलमोहर को धूप की घानी दिखाकर नहीं मिला कुछ

    इस अनमन्यस्यकता पर शुभकामनाएँ पाकर क्या मिला

    हमारे पास जो उत्तर थे

    वे इतने हावी हो चले थे कि जीये जाने से असंतुष्ट थे और मर जाने से असहमत

    मेघों ने मेघों में टूटना मना किया जब

    विवेक भी विवेकों से उकता चुका था

    पीठ पर पानी के कोड़े फूटते थे

    देह तब देहों में टूटने लगती

    जब चलते-चलते गिर जाते पसंदीदा कवि की पंक्ति खींचती थी हमें

    उदास मछली के आँसू हमारे ख़ून में गिरते थे

    फिर भी हम जीने का साहस खोज लाते थे

    जबकि निराशा के विलोम के भरोसे हम कभी नहीं रहे

    असल में जो हमें डराता था

    उससे हम ऊब चुके थे

    कई-कई बार

    कंडाल चुके थे

    जिनमें फूले उनमें सूख चुके थे

    जब पूरा शहर सो जाता था

    अंधेरे में एक गुड़हल की तरह खिल जाती थी पूरी देह

    हम देह को चूमते थे

    जीवन को हृदय से लगाते थे

    हमारे घुटनों पर खरगोश दौड़ने लगते थे

    जीने से ख़ुश हो बैठते

    लेकिन सवेरा होते ही

    ऐसा उबाल आता था

    कि ज़िंदगी को कभी माफ़ नहीं कर पाते थे

    हमारे सपनों में ईश्वर टट्टू की शक्ल में सोने की रेल खींचता रहता था।

    दूध के मालपुए खाता था और चाँदी की लीद करता था।

    हम बैठे-बैठे सोचते थे कि पूँजी का रंग चमकदार क्यों हैं

    और यह क्या झुनझुना है जिसे पूरा देश बजाना चाहता है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सत्यव्रत रजक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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