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सनातन पुरुष

sanatan purush

आरसी प्रसाद सिंह

आरसी प्रसाद सिंह

सनातन पुरुष

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    कोन देशमे हमर वास नहि,

    कोन कालमे हम नहि रहलहुँ!

    पानि कोन घाटक नहि पीलहुँ,

    कोन नदीक धार नहि बहलहुँ?

    अछि अनादि इतिहास हमर,

    भूगोल हमर लीलालय-प्रांगण।

    मन्दिर मस्जिद गिरिजाघर

    हमर चेतना केर निकेतन।

    गौर, श्याम, पीताभ कतहुँ हम,

    कतहु घोर काजर-सन कारी।

    अनगिन भूषा-वेश हमर अछि,

    एक रूपमे नर नारी।

    ग्राम, नगर, पथ, हमर मनोरथ,

    कला, सभ्यता, संस्कृति-ग्राहक।

    आगम, निगम, काव्य, स्मृति, दर्शन,

    नाटक, नृत्य केर संवाहक।

    जाहि मार्गसँ हमर वाहिनी

    चलल, बनल से तीर्थ-तपोवन।

    युग-प्रवाह भऽ गेल अग्रसर

    चरण-चिह्न पर हमर चिरंतन।

    नील नदी तट पर 'पीरामिड'

    कीर्ति-पताका हमरे फहरय।

    गंगा, गोदावरी, सिन्धु—

    घाटीमे हमरे गर्जन घहरय।

    परम पुनीत हमर आश्रम छल

    गूँजि उठल ओंकार मन्त्र लऽ।

    साम-गान गाबैत छला सुर

    यज्ञ-भूमिमे सोम-पान कऽ।

    अमृत हेरि हम आनल भूपर,

    पाथरमे देवत्व उतारल।

    वायु-यान, विद्युत, अणु ऊर्जा,

    अंतरिक्षमे झंडा गाड़ल।

    द्वीप-द्वीपकेँ सेतु-बंधसँ

    जोड़ि देल हम सागर-चारी

    चन्द्र-लोक धरि रोपि पयर हम

    घूमि रहल छी गगन-विहारी।

    शासन, शिल्प, न्याय निर्माता,

    राजनीति, विज्ञान-विनायक।

    राजतंत्रसँ साम्यवाद धरि

    हम स्वतंत्रता-गीता-गायक।

    हिन्दू कतहु, कतहु ईसाई;

    मुसलमान कहबैत कतहु छी।

    भारतीय, चीनी, जापानी,

    परिचयमे जनबैत कतहु छी।

    मुदा, रक्त तऽ वैह देहमे;

    एक हृदयमे प्राणस्पन्दन।

    भाषा, धर्म, अनेक पथ-मत;

    मुदा, एक दुख-सुख, जग-जीवन।

    युद्ध, कलह, विद्वेष घृणा,

    संहार, शोक, संताप, पराजय,

    दानवता सब दुर्गुणसँ

    हमर विरोध करैए निर्दय।

    हम मानवता छी, तथापि हम

    आगाँ सदा बढ़ैत रहय छी।

    सत्य, अहिंसा, करुणा, मैत्री,

    प्रेमक पाठ पढ़ैत रहय छी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 13)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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