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सच से सामना

sach se samna

मधु चतुर्वेदी

मधु चतुर्वेदी

सच से सामना

मधु चतुर्वेदी

और अधिकमधु चतुर्वेदी

    सच से सामना

    अपने साथ कई परिणाम लाता है—

    विषाद की पीड़ा,

    ठगे जाने की खीझ,

    अँधेरे में जीते रहने का पश्चाताप

    टूटती आस्थाओं का क्षोभ,

    अपने ही अज्ञान से उपजी घृणा

    असत्य पर किए गए विश्वास की ग्लानि,

    छल को पहचान पाने का आक्रोश

    हाँ—

    सत्य का उद्घाटन

    बहुत कुछ साथ लाता है

    जैसे सामने से छँट जाए तीखा धुआँ

    और अचानक

    अँधेरे कुएँ का तल दिखने लगे

    धुँधले चित्र,

    भरम,

    मृगतृष्णाएँ—

    सब

    नंगे हो उठते हैं

    पूर्वधारणाएँ दो-फाड़ हो जाती हैं,

    मिथ्या के कमज़ोर किनारे ढह जाते हैं

    सत्य केवल सत्य है—

    निष्कंप,

    निडर,

    निर्लज्ज,

    नग्न

    वह पूर्वनियोजित स्वप्निल संसार को

    एक ही झटके में तहस-नहस कर देता है

    वह कुरूप भी है,

    निर्दय भी,

    कठोर,

    पथरीला

    पर यदि

    इस पथ को स्वीकारने का साहस हो

    तो आगे—

    राह अधिक स्पष्ट होती है,

    अधिक स्थिर,

    अधिक भय-रहित

    झूठ की मायावी चिलमन के पार

    सत्य को धीरे-धीरे

    नसों में उतरने दो

    हलक़ को

    उसकी कड़वाहट के लिए तैयार होने दो

    जब सहने की शक्ति आए,

    जब स्वीकार की चेतना जागे—

    तभी हृदय को उसे अपनाने दो

    इन सोपानों के पार

    एक प्रकाश दिखाई देगा

    वहीं कहीं तुम्हें बोधि-वृक्ष मिलेगा

    असत्य की प्रसन्नता

    और

    सत्य की पीड़ा—

    दोनों क्षणिक हैं

    सत्य—

    सहज है

    शाश्वत है

    निडर है

    वह है—

    संयमित

    निर्विवाद

    स्थायी

    अनहद

    मुखर

    और अंततः

    अत्यंत सुंदर!

    स्रोत :
    • रचनाकार : मधु चतुर्वेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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