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सभ्यता की मार खाई हुई स्त्री

sabhyata ki maar khai hui stri

पूजा कुमारी

पूजा कुमारी

सभ्यता की मार खाई हुई स्त्री

पूजा कुमारी

और अधिकपूजा कुमारी

    पतित होने के और भी रास्ते थें मैंने कविता चुना

    मैं सभ्यता की मार खाई हुई स्त्री हूँ

    मुझे हक़ है अपने हक़ में बोलने का

    चौखट के भीतर अँधेरी गुफ़ा है

    सांप और बिच्छू हैं डंक मारने को

    बाहर भेड़ियों के झुँड‌ से घिरी हुई मैं

    जहाँ पाँव रखती हूँ

    धंसती हूँ

    नेपथ्य में उभरते अट्टहास

    सम्मुख ही रचते हैं षड़यंत्र

    एक चेहरा परिदृश्य में दाख़िल होता है

    यह कहते हुए कि अपराध बोध से तुम्हें मर जाना चाहिए

    मेरा कोई चेहरा नहीं

    पहचान नहीं

    पांव के नीचे ज़मीन नही

    बावजूद इसके खड़ी हूँ तनकर

    असहनीय है यही एक बात

    टूटती हूँ

    नियति की मार मरती हूँ

    अपना पार्थिव शरीर अपने कंधे पर लेकर चलती हूँ

    यात्राएँ जटिल है

    बिछे हैं काँटे चारो ओर

    चप्पलों तक ने नहीं बख़्शा मुझे

    उपेक्षितों में उपेक्षित

    अब अपने साथ खड़ी हूँ

    दुःख मेरी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा है

    दुःखों के समुच्चय से होता है कविताओं का जन्म

    दुःखों से घिरी हुई मैं

    जो नहीं थी वह होने का आरोप लगा मुझपर

    जो हूँ उसे रौंद दिया गया हर दिन

    मेरी देह अब त्वचा का भार छोड़ती है

    पत्थर की परत चढ़ाती हूँ मन और देह पर

    एक दिन ब्रह्माँड के कानों तक पहुंचेगी मेरी चीखें

    बदलेंगे सृष्टि के सारे नियम

    और एक सुंदर दुनिया के निमित्त

    रास्ता खुलेगा

    मैं सभ्यता की मार खाई हुई स्त्री हूँ

    कहने को वर्जनाओं से मुक्त

    बंधी हुई भावनाओं के जड़ खूँटे से

    मेरा देय सदियों से अमान्य रहा

    इतिहास के पृष्ठों से ग़ायब मैं

    पूछती हूँ कौन हूँ मैं प्रतिध्वनित होता है शून्य

    मेरी चिंताएँ निरंकुश हो जाने को आतुर हैं

    कि मिले सब प्रश्नों के प्रतिउत्तर

    जीवन के रास्ते कुश कबार से भरे हुए हैं

    क्रूरताओं का थप्पड़ गालों पर अंकित है

    घृणा की लातें मेरी आत्मा पर

    मेरी कमर झुक गई है

    धर्म का बोझ उठाते उठाते

    स्त्री के सामूहिक अतीत की नियमावली बनाकर

    किसी ढीठ की तरह खड़ा है समय

    भरी पंचायतों में निर्वस्त्र हुई स्त्री की लज्जा

    रखने नहीं आता कोई अवतारी पुरुष

    मैं तो सदियों से निर्वस्त्र खड़ी थी

    सभ्यता के बनैले मुंह पर धब्बा जैसी

    शिष्ट समाज की आत्मा पर थूकती

    सदियों तक किया इंतज़ार अपनी बारी का

    मुझे खटाया गया खूँटे के बैल की तरह

    मेरी पुरखिनों की थकान मेरी आत्मा पर पसरती जा रही है

    मैं न्याय की पाठशालाओं से बहिष्कृत

    सभी सम्मानों से वंचित

    धरती की छाती पर बोझ सरीखी

    आत्मा पर लगी सभ्यता की कालिख छुड़ाने के लिए

    रगड़ती हूँ एड़ियाँ भटकती हूँ अपने अरण्य में

    मैं सभ्यता की मार खाई हुई स्त्री हूँ

    मेरी नींद अब भी अपनी पुरखिनों की हँसिया दराती की खनक से खुलती है

    सपने में आसमानी इंद्रधनुषी रंग

    अभी भी दूर से ही व्यंग्य में मुस्कुरा रहा

    और मेरी देह पर टिकी हुई हैं सभ्यता की अश्लील आँखें

    स्रोत :
    • रचनाकार : पूजा कुमारी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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