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सब यहीं

sab yahin

अनुवाद : उदय शंकर भट्ट

यानुष षुबेर

यानुष षुबेर

सब यहीं

यानुष षुबेर

और अधिकयानुष षुबेर

    घुर्राने और थुर्र-थुर्र की आवाज़ों के बीच,

    लगभग काली पड़ चुकी कीचड़ में,

    पच्च-पच्च करते रबर के जूते पहने,

    सूअरबाड़े की धूसर इमारत के अंदर,

    उन्होंने कड़ी मेहनत की,

    मेढकों की प्रचुरता के दौर के तौर पर

    आई उस गीली गर्मी में,

    बौने चीड़ और जुनिपरों के इस ग़रीब इलाक़े के

    इस बाड़े में,

    जो कि सचमुच किसी क़ायदे का नहीं था,

    उनका यहाँ काम करना एक संयोग ही था,

    आंशिक रूप से भीगे ढलान के किनारे पर स्थित,

    गीली घास का यह चरागाह,

    जहाँ सप्ताह में एक या दो बार

    सीमावर्ती गश्तीदल

    हेलीकॉप्टरों के पेटू फतिंगों के भीतर उड़ते थे,

    सब कुछ यहीं था,

    ख़ालीपन के एहसास के बावजूद वे मीलों तक ख़ुद को खींच रहे थे,

    बंजर ज़मीन, कोई और नहीं, पूरी तरह से ख़ुद की बंजरता भर गया था,

    और जब तुम उस कामचलाऊ शराबघर की छत के ऊपर

    बिना इस बात की परवाह किए कि तुम्हें कुछ सिद्ध करना है,

    बियर पी रहे होते थे

    तब सब कुछ यहीं और इन्हीं में स्थित होता था

    और जो कभी भी, किन्हीं रूपक-प्रतीकों के जंजाल में नहीं फँसता था।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : यानुष षुबेर

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