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साँस कितनी शेष है

saans kitni shesh hai

शिवम् अवस्थी

शिवम् अवस्थी

साँस कितनी शेष है

शिवम् अवस्थी

और अधिकशिवम् अवस्थी

    टूटते हैं रोज़ तारे, आसमाँ के आँगनों में,

    और कितने घाव गहरे, छुप रहे हैं इस बदन में।

    जो अधूरी रह गई हैं, वो दुआएँ चीख़ती हैं,

    वक्त की इस पाठशाला में, निगाहेँ सीखती हैं।

    इस छलावे के नगर में, आज सच के भेष कितने!

    तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

    आदमी के पास आख़िर, साँस कितनी शेष है?

    जिन ख़यालों की पकड़कर, उँगलियाँ हम चल रहे थे,

    ख़्वाब के कच्चे घरों में, हम अकेले पल रहे थे।

    टूट कर बिखरे हैं वादे, रह गए आधे इरादे,

    लुट गई है हर तमन्ना, हम जाने कब थे सादे।

    इन अधूरी चाहतों के, रहे संदेश कितने!

    तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

    आदमी के पास आख़िर, साँस कितनी शेष है?

    अजनबी से हो गए हैं, जो कभी अपने बहुत थे,

    वो फरिश्ते आज गुम हैं, जो कभी सपने बहुत थे।

    आईनों ने भी हमारी, शक्ल पहचानी नहीं है,

    आँसुओं की इस नदी में, अब बचा पानी नहीं है।

    दर्द के इस दरमियाँ अब, पल रहे हैं क्लेश कितने!

    तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

    आदमी के पास आख़िर, साँस कितनी शेष है?

    धूप की ढलती रवानी, छाँव को अब ढूँढती है,

    बर्फ़-सी ठँडी ये रातें, ताप को अब ढूँढती हैं।

    फिसलती ही जा रही है, उम्र की ये कच्ची डोरी,

    हो रही है साँसों की भी, हर क़दम पर जैसे चोरी।

    इस किनारे बैठ कर हम, गिन रहे अवशेष कितने!

    तुम बताओ, दिल में अब भी, आस कितनी शेष है?

    आदमी के पास आख़िर, साँस कितनी शेष है?

    स्रोत :
    • रचनाकार : शिवम् अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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