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रोपि देतै नवका गाछ

ropi detai navka gaachh

राज

राज

रोपि देतै नवका गाछ

राज

और अधिकराज

    सुनै छियै जे

    अइ गाछ तर कहियो

    भरिदुतियाक ठेहिआएल सुस्ताइ छलै

    जाइ छल नव फुर्ती चैतन्य ल' क'

    तकर बाद भेलै एकटा धोधरि ओइ गाछमे

    एकटा अनदेशिया साँप बास ल' लेलकै

    गाछ तर रहनिहारक भ' गेलै हाकिम

    पीब' लगलै ओकर हिस्साक दूध देहक शोणित

    लोक सभ तमसायल

    भगौलक कहुनाक' ओइ साँप के उकाठी-तुकाठी देखाक'

    लोक सभहक आगू-आगू रहै एगो बबाजी

    तें साँप नै मारल गेल

    सहजहिं गाछ पर

    बाज, बगुला, नढ़िया मूसक अधिकार भ' गेलै

    ठेहिआएल लोकक लेल बनलै टू स्टार होटल

    दूध पर प्रतिबंध भेलै

    मासे-मासे शोणित जमा करब जरूरी भ' गेलै

    से जाबत तक एना भगौनाइ बसौनाइ चलतै

    त' बाजक बदला औतै लकरबग्घा

    सुतली राति ल' जेतै बच्चा सभ के उठाक' तैं

    हेतै आब यैह

    जे उखाड़िक' अइ कोकनल गाछ के

    फेक देतै—आ

    रोपि देतै नवका गाछ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 15)
    • रचनाकार : राज
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
    • संस्करण : 2011

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