तमसा

और अधिकसंदीप तिवारी

    बरसात में लबालब भर जाती वह

    भर जाती तो सुंदर लगती

    अचानक से बढ़ जाती उसकी उमर

    उसकी काया

    अचानक से खिल जाता

    उसका रूप

    गर्मियों में वह सूखी बहती

    जैसे भीतर से रोती हो कलप-कलप के

    पी जाती अपने आँसुओं को

    अपने ही कंठ से

    जब उसमें पानी नहीं होता

    तब भी उसका पुल काम आता

    लोग सूखी नदी को भी

    पुल से करते पार

    पुल पर ही खड़े होकर

    हम साइकिल की घंटियाँ बजाते

    हमें लगता कि नदी अभी उछलकर

    जाएगी पुल पर, हमसे मिलने

    कथाओं में भी आया इस नदी का नाम

    वनगमन के समय

    राम पहली रात रुके थे

    इसी नदी के किनारे

    आह!

    कितना कृतघ्न! कितना डरपोक!

    कि मैं एक भी दिन नहीं सो सका

    तमसा के किनारे

    शहर गया और भूल गया

    उसका रूप

    भूल गया उसके जल को

    भूल गया उसका साथ

    भूल गया उसका भूगोल

    अब आस-पास के कितने क़स्बों

    बाज़ारों, मिलों के कचरे को ढोती है वह

    वह बड़ी नन्ही-सी है बड़ी नाज़ुक-सी

    और उसके काँधे पर लाद दिया गया

    उसकी उम्र से ज़्यादा का भार

    जब सारी बड़ी-बड़ी नदियाँ थक गईं

    तो तमसा तो दुधमुँही है

    सूख गई ढोते-ढोते कचरा

    रूठ गई वह

    हमारे साथ खेली हमसे ही रूठ गई

    साइकिल की घंटी सुनकर भी

    अब चुप लगा जाती है वह!

    स्रोत :
    • रचनाकार : संदीप तिवारी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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