पिता! अहाँ हमरा दोख नै देब
पड़ौआ-परचट जुनि कहब
हमर सबूरक बान्ह टूटि गेल पिता
जहनि कि मायक दूधक बदला छोटका बौआक
मुहमे खून भरि गेल रहै
अहाँ ओहि दिन अध-निनामे बौआइत रही
अहाँक 'हम' बाजि रहल छल
छटपटा रहल छल
आ हम सुनि नेने रही
जेकरा जागलमे अहाँ ने कहियौ कहलौं
'आ' ने कहितौं
अहाँ जकाँ भूखल पेट अन्न भरल
बाधक ओगरबाहि करबाक धैर्य
हमरामे नै ऐ पिता!
'बड़ उमेद स' एहि घर के बनौने रही
मुदा कहियो निचूब नै भेल ई—
कहियो उतापसँ हमर रक्षा नै क' सकल
अहाँ बिस्नाइत रही पिता कि...?
हमरा भेल रहय जे ओही क्षण ओही घर के
मुदा अहाँक मान्यतापर तैयो प्रहार नै केलौं—
मात्र अपन अकास टा फुटका लेलौं
तें एतबे नेहोरा हमर जे—
हमरा घुमाबी जुनि आ परचट टा नै कही
- पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 47)
- रचनाकार : राज
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
- संस्करण : 2011
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