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रफ़ी और जगजीत

rafi aur jagjit

ऋषिता सिंह

ऋषिता सिंह

रफ़ी और जगजीत

ऋषिता सिंह

और अधिकऋषिता सिंह

    दिन का अंतिम प्रहर बीतने को था

    और स्याही आकाश को ख़ुद में समेटे जा रही थी।

    किताब की अंतिम पंक्ति कह रही थी—

    प्रिय मेघ, तुम्हें कभी अपने प्रिय से एक क्षण का विरह ना हो!

    किताब को बंद करके मैं कुछ हस पडी!

    कालीदास ने मानो सभी प्रेमियों के हिस्से का मिलन उस मेघ को थमा दिया था

    और प्रेमियों के हिस्से आया उसका अथाह विरह।

    इतना सघन विशाल विरह की कोई दूत इस पीढ़ा का पता भी ना पा सके।

    प्रयास भी करे तो रेगिस्तान के मिराज से टकराए

    और पुनः प्रयास से पहले, इस विरह वन की वेदना में

    स्वयं एक प्रेमी बन जाए। फिर सोचने लगी कि प्रेम का स्थायी भाव

    यदि मिलन होता तो ना कविता जन्म लेती ना अश्रु।

    दोनों के जन्म के लिए ही शायद मेरे ईश्वर ने प्रेम का स्थाई भाव वेदना को रखा है।

    क्यूंकि मिलन में तो वह एक ही है,

    पर विलग होते ही जिस सम्त देखती हूँ,

    सिर्फ़ वही दिखाई देता है।

    हर आवाज़ उसके आने की उद्घोषणा लगती है।

    कालिदास की दुनिया से बाहर देखती हूँ

    तो मुझे मेरा अकेलापन झकझोर देता है।

    दिन का अंतिम प्रहर, स्याह आकाश और मेघदूत और उनके बीच बैठी मैं,

    किसी कालजयी रचना को रचने के असफल प्रयास में।

    यदि लेखन मात्र अनुभवों से आता तो कितना कुछ था लिखने को मेरे पास—

    जीवन, संघर्ष, मिलन, बिछड़न और एकांत।

    लेकिन अनुभव लेखन नहीं होते, लेखन तो अनुभवों का नृत्य है

    और नृत्य करना मैंने कभी सीखा ही नहीं!

    बहरहाल अपने अकेलेपन को अपने आंचल में समेटकर मैंने चाय बनाने का सुदृढ़ निश्चय किया।

    जैसे ही दो कप दूध में दो चम्मच चाय पत्ति मिलाई, भुरा रंग खिलकर सामने आया।

    मैं चाय हमेशा उतनी ही गाढ़े रंग में ढलने देती हूँ

    जितना गाढ़ा रंग उसकी आँखों का था और जैसे ही चाय उतनी पक जाती

    जितनी उसे पसंद थी, मैं गैस बंद कर देती।

    मैंने चाय छानकर हर घूँट के साथ उसे याद किया।

    उसकी बातें अपने नियमित क्रम से मेरे मन की परिक्रमा करने भी आईं।

    परिक्रमा के बाद मैंने उन्हें जाने दिया वैसे ही जैसे उसे जाने दिया था—

    बिना प्रश्न किए, सहजता से। बिना प्रश्नों के जैसे वो मेरे जीवन में आया था।

    रोका क्यु नहीं? इसलिए कि रोकने का कोई कारण नहीं था—

    क्यूंकि प्रेम बांधता नहीं और प्रेम के अतिरिक्त मेरा उससे कोई दूसरा संबंध नहीं था।

    रफी के गीत सुनाने वाला मेरे जगजीत की ग़ज़ल लेकर चला गया

    और मैं आज भी उसी झरोखे पर बैठी हूँ,

    जहा दिन के अंतिम प्रहर से पहले उसने कहा था,

    मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई है,

    मुझे पलकों की छाव में रहने दो!

    मैं पलकों को बंद करने से कतराती रही

    और वो मुझे ग़म का खजाना थमा गया।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऋषिता सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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