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रद्दी

raddi

विकल्प दुबे

और अधिकविकल्प दुबे

    रद्दीवाला रोज़ आता है

    अपने काम में मगन

    गली में आवाज़ लगाता है

    मैं कभी कभी बुलाता हूँ उसे

    और किलो के भाव बेंच देता हूँ

    सारी बेकार की चीज़ें

    अखबारों में छपे नाकामी के क़िस्से,

    पढ़कर फेंक दिए गए ख़त,

    आँसुओं से भरी बियर की बोतल

    पहले प्रेम पर छपी

    पीले पन्नों की पुरानी किताब

    दो कौड़ी के तानों की साप्ताहिक मैगज़ीन

    सबके रेट फिक्स कर रखे हैं

    लेकिन मुझे

    किलो में पचास पैसे अधिक देता है

    मैं भी ख़ुश रहता हूँ

    कि चलो

    गंदगी तो साफ़ हुई

    कमरा फिर जगमगाएगा

    मेरे इतिहास को बेंचकर

    कोई अपना घर चलाएगा

    कल ही बेंचा था सारे कूड़े को

    कि आज वो फिर आ धमका

    हँसता-हँसता, चमका-चमका

    कहने लगा, साहब!

    आपके पास बहुत रद्दी होती है

    अच्छे पैसे बन जाते हैं

    अगर कुछ माल और है तो दे दीजिए

    कल त्यौहार है

    मेरा काम निकल जाएगा

    मैं हँस पड़ा

    अब उसे कैसे समझाऊँ

    रोज़ रोज़ नहीं बनते यादों के टीले ऊँचे से

    क्या बतलाऊँ

    मेरे भाई! अख़बार भी

    दिन का एक ही छपता है

    ढेरों दुःख हैं जीवन में

    पर इतने नहीं हैं

    कीमती रद्दी जमा करने में समय लगता है

    दो हफ़्ते बाद आना

    सब बटोरना

    ले जाना

    स्रोत :
    • रचनाकार : विकल्प दुबे
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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