रात जिसमें कुछ भी सुनाई नहीं देता
raat jismen kuch bhi sunai nahin deta
ज़ेवियर विलोरूशिया
Xavier Villaurrutia
रात जिसमें कुछ भी सुनाई नहीं देता
raat jismen kuch bhi sunai nahin deta
Xavier Villaurrutia
ज़ेवियर विलोरूशिया
और अधिकज़ेवियर विलोरूशिया
गुनाह से ठीक पहले
एक सड़क की मानिंद सुनसान चुप्पी के बीचोंबीच
यहाँ तक कि साँस भी न लेते हुए
ताकि दीवारों से रहित एकांत में
मेरी मृत्यु में कोई विघ्न न पड़े
इस वक़्त जबकि देवदूत फ़रार हो चुके हैं
इतने धीमे से एक अथाह गहराई में जाने के लिए
बाँहें फैलाए बग़ैर
मैं अपनी रक्तहीन मूर्ति अपने बिस्तर की क़ब्र पर छोड़ देता हूँ
और यही चीज़ मुझे पुनर्जीवित करती है
जो कभी था ही नहीं
यह एक अनपेक्षित दर्द है बेहद ठंडा और ज़्यादा तीक्ष्ण
न होता यह किंतु वह मूर्ति जगाती है मुझे दुनिया के शयनकक्ष में
जहाँ हर चीज़ निर्जीव हो चुकी है।
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : ज़ेवियर विलोरूशिया
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