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पुस्तकचिह्न

pustakchihn

शांदोर कान्यादी

अन्य

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शांदोर कान्यादी

पुस्तकचिह्न

शांदोर कान्यादी

और अधिकशांदोर कान्यादी

    (नवफ़ाशीवाद के विरुद्ध)

    ऐसे मौक़े आते हैं जब एक बार फिर से आग की लपटों में

    खाँसने लगते हैं हम जब धुआँ ऊपर की ओर

    उमड़ने लगता है और हमें लगता है जब

    एक के बाद एक पुस्तक

    जला दी जाती है मानो हमारा मस्तिष्क ही

    स्वाहा हो रहा हो

    आता है वक़्त जब एक जो बच निकला था

    उसी को दुर्लभ शिकार की तरह अब

    घेरा जा रहा है फिर

    आधी रात बीत चुकी हो तब दरवाज़े पर

    बज उठती है घंटी

    और फिर फ़र्श पर चूहों-सी खटर-पटर

    मेज़ों दराज़ों में उलट-पुलट खोजबीन

    चीज़ें गिरी बिखरी पड़तीं अहाते में

    संदिग्ध पुस्तक के साथ पकड़ में आए हम

    अब नहीं छोड़ेगा ये क़ानून

    ऐसे मौक़े आते हैं जब युक्तियाँ

    तो दे दी जाती हैं लेकिन

    जायज़ वजह कोई बतलाता नहीं है

    कि क्यों आख़िर किसलिए

    एक घूँट में जो फ़ना हो गई

    उनकी आँतों में उस पुस्तक की

    क्यों तो बनाई लुग़दी उन्होंने

    जिसने कि अभी नहीं खोली थी आँखें

    दिन के उजास में

    उसको कर दिया बंद अंधे अनंत में

    आते हैं ऐसे मौक़े जब काँइयाँ

    डाक घर भुला देता चिट्ठी रसाना

    और अगर जुरअत की हमने कुछ कहने की

    तो वे झाड़ लेंगे हाथ पोंटियस पिलेट की तरह

    ऐसे आते हैं मौके जब पलक झपकाए बिना

    वे पूछते जाँच करते कोंचते और भेद लेते—

    कहते ले आओ यहाँ और क्या छिपाया है उसमें

    जब तक कि हमारे शर्ट-पैंट

    चूने लग जाते हैं

    मानो कि खुदरा चुराते किसी मामूली

    चोर उचक्के की तरह शर्मसार हों हम

    मानो उन्होंने जो छीना है हमसे

    वह हमारी रीढ़ थी—

    हम डगमग क़दमों से आते हैं अकेले

    गलियारे में कँपते हाथों से

    सिगरेट के मुड़े छोर को और कटुता को

    जलाने की कोशिश हम करते हैं

    कटुता—बस यही तो जानी है जीवन भर

    ख़ुश्क हमारे मुँह की किनार वह कुरेदती

    स्रोत :
    • पुस्तक : दस आधुनिक हंगारी कवि (पृष्ठ 91)
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक गिरधर राठी, मारगित कोवैश
    • प्रकाशन : वाग्देवी प्रकाशन
    • संस्करण : 2008

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