Font by Mehr Nastaliq Web

जन-जागरण

jan jagran

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    जागऽ तोँ जनता जनार्दन, देश वैह छऽ तोहर।

    तोँ सूतल छऽ चोरक दल लूटि रहल छऽ मोहर।

    देश वैह छऽ तोहर, उज्जवल कीर्ति ध्वजा फहरै छै।

    माटि-पानि लै जकर विदेशी एखनो धरि तरसै छै।

    तोँ बिसरल-भूलल अपनाकेँ दुर्बल मानि रहल छऽ।

    तोँ सिंहक सन्तान सनातन, छागर जानि रहल छऽ

    कतऽ गेल छऽ ऊर्जा? तोहर रुधिर-प्रवाह कतऽ छऽ?

    कतऽ गेल छऽ आस्था? जीवन- प्रति उत्साह कतऽ छऽ?

    मरि ने सकबऽ कालजयी तोँ, पीबि अमृत-रस-लहरी।

    जागऽ देश हमर हे भारत, जगा रहल युग-प्रहरी।

    हमर देश तोँ सोच कर जुनि, उठऽ उठऽ हे शाश्वत।

    शुद्ध सनातन, सत्य चिरन्तन, अमर निकेतन भारत।

    दिन फिरतह तोरो निश्चय, अन्धकार ने रहतै।

    ने रहतै घोर निराशा, कुण्ठा कुत्सा सहतै।

    बहतै कनक-किरण धारामे कलुष-कालिमा लोकक।

    शोकक अयतै निशा, दिशा भऽ जगमग जग आलोकक।

    छऽ अतीत तोहर महिमामय, अद्भुत गौरव-शाली।

    नाचल छऽ तोरे आँगनमे लीलामय बनमाली।

    उज्जवल छऽ भविष्य, युग तोहर लिखि इतिहास रहल छऽ।

    तोँ चीन्हह अपना, के तोँ? की आकाश रहल छऽ।

    अयतह पुनि ऋतुराज विपिनमे, मधुकर करत गुंजन।

    सूखल डारि फेर भऽ जयतऽ हरियर हरियर उपवन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY