चारों ओर सफ़ेद पलस्तर की हुई दीवारें हैं। बिल्कुल नई-नकोर नज़र
आती, जैसे अभी हाल में तैयार हुई हों, जबकि सच यह है कि सदियों
पहले चढ़ाया गया था उन पर पलस्तर। मगर, चूँकि यहाँ क़याम करने
वालों के पास कभी कोई असबाब नहीं रहा—गाहे-ब-गाहे ही साँस ले
पाते थे वे, रहते थे बे-आवाज़ (वैसी हालत में आग-वाग जलाने का
सवाल ही पैदा नहीं होता), लिहाज़ा सफ़ेद दीवारें न कभी गंदी हुई, न
ही धुआँई, बल्कि हरदम ताज़ा नज़र आईं।
सफ़ेद पलस्तर वाली एक दीवार में ('एक दीवार' इसलिए कह रहा हूँ
मैं कि वहाँ कहीं-कोई रोशनदान नहीं है, लिहाज़ा दिशा के बारे में
ठीक-ठीक कुछ कह पाना मुमकिन नहीं) एक दरवाज़ा है। दरवाज़ा
क्या; दरअस्ल दरवाज़े की यथार्थवादी पेंटिंग। अगर दरवाज़े को खोला
जा सके, तब भी उसके पीछे सफ़ेद पलस्तर वाली दीवार के सिवा कुछ
न होगा। छत बेहद ऊँची मगर ऊँचाई के साथ-साथ सँकरी होती जाती।
दरअस्ल समूची भीतरी बनावट किसी 'क्यूब' पर रखे एक
लंबोतरे 'कोन' जैसी। उसका सबसे ऊँचा सिरा इतना सँकरा, कि उसे
किसी बालों की काँटी से ही साफ़ किया जा सके। दीवारों की भाँति छत
भी सफ़ेद पलस्तर चढ़ी हुई, लेकिन दरहक़ीक़त वहाँ भी धूल का एक
ज़र्रा तक नहीं।
चट्टानी फ़र्श है उसका। चट्टानी क्या; दरअस्ल धरती की परत का
असली ग्रेनाइट, पॉलिश किया हुआ। फिर भी उसे पक्की तरह चौरस
नहीं कहा जा सकता। सैकड़ों साल तक असंख्य लोग उस पर से होकर
गए हैं (खड़ाऊँ, चप्पल, फुल्ली-जड़े बूट पहने और नंगे पैर) और
पत्थर घिसा है। इस घिसाई का सबसे ज़्यादा असर बीचोबीच हुआ,
जहाँ सबसे ज़्यादा नीचाई है। इसका मतलब हुआ कि ज़्यादातर लोगों ने
कमरे के बीचोबीच खड़े होने का चुनाव किया होगा। अगर तुम ग़ौर से
देखो, तो सतह पर ख़ून के बहुत हल्के धब्बे पहचान में आ सकते हैं।
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 402)
- रचनाकार : शुन्तारो तानीकावा
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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