प्रेरणाएँ!
प्रेरणाएँ!
बूढ़ी हो चुकी थीं प्रेरणाएँ…
वे बर्तन थीं जो बजने लगते थे अचानक
कुछ देर तक खनकती थी आवाज़ जिनकी
दूर तक गूँजती थी भीतर
फिर झाड़ी-झाड़ी से
झड़ने लगती थी
अमावस
प्रेरणाएँ!
प्रेरणाएँ!
ढेर में आईं प्रेरणाएँ
फिर संग्रहों में
मरते हुए आदमी के आख़िरी उवाच् से आईं
पुस्तकों और प्राचार्यों से आईं
भय का विपर्यय और जीवन का समस्थानिक
विकल्प वे कभी नहीं थीं
जिए जाने की कथावस्तु तो नहीं
जिए ही जाने की कथा की वस्तुएँ अवश्य थीं
प्रेरणाएँ!
प्रेरणाएँ!
खनकती रहीं प्रेरणाएँ
बर्तन थीं
जिन्हें माँजते रहे आजीवन
जबकि एक बार भी उनने पेट नहीं भरा
उनमें अन्न तो ज़रा भी न था
जी ज़रूर मिचलाया उन्हें जूठा करते हुए
एक आदर्श सूक्ति
सड़ती रही पेट में
कच्ची मछली की तरह!
- रचनाकार : सत्यव्रत रजक
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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