प्रेम शब्द के विविध रूप
prem shabd ke vividh roop
यह वह शब्द है जिससे हम रिक्तियों को भरते हैं
यह ठीक बैठता है वाणी की उन उष्ण रिक्त जगहों के लिए
पृष्ठ पर उकेरी लाल दिल के आकार की उन रिक्त आकृतियों के लिए
जो वास्तविक दिल जैसी बिलकुल नहीं दिखतीं
थोड़ा अलंकरण जोड़ दो तो यह विक्रय-योग्य
भी हो जाता है।
हम इसे उस एक रिक्त स्थान में भी भर देते हैं जो
मुद्रित प्रपत्र में होता है और जिसके साथ कोई निर्देशिका नहीं होती
ऐसी पत्रिकाएँ पाई जाती हैं जिनमें बहुत कुछ नहीं होता
सिवाय प्रेम शब्द के
तुम इसे अपने पूरे शरीर पर मल सकते हो
और तुम इससे भोजन भी बना सकते हो
हमें कैसे ज्ञात हो कि यह वही नहीं है जो घटता है
आर्द्र गत्तों के नीचे घोंघों की शीतल उच्छृंखलताओं में?
और जहाँ तक सलाद-पत्तियों के बीच अपनी कठोर थूथन ऊपर उठाते
खरपतवार-अंकुरों का प्रश्न है—वे इसे ही पुकारते हैं
प्रेम! प्रेम!—सैनिक गाते हैं, अपनी चमकती छुरियाँ
सलामी में उठाए
और फिर हम दोनों हैं
यह शब्द
हमारे लिए अत्यंत लघु है,
इसमें केवल ढाई अक्षर
इतना विरल कि तारों के बीच उन गहन निर्वस्त्र रिक्त प्रदेशों
को नहीं भर पाता जो अपनी बधिरता से हम पर दबाव डालते हैं
यह प्रेम नहीं है जिसमें हम गिरने की इच्छा
नहीं रखते, बल्कि वह भय
यह शब्द पर्याप्त नहीं है, फिर भी इसी से काम चलेगा
यह इस धात्विक मौन में एक एकाकी स्वर है—एक मुख
जो “ओ” कहता है बार-बार, विस्मय में
और वेदना में
एक श्वास
खड़ी चट्टान के किनारे
एक अंगुली की पकड़
तुम इसे थामे रह सकते हो
या छोड़ सकते हो।
- रचनाकार : मार्गरेट एटवुड
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए शायक आलोक द्वारा चयनित
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