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प्रेम कविता

prem kavita

अर्पिता धमीजा

अर्पिता धमीजा

प्रेम कविता

अर्पिता धमीजा

और अधिकअर्पिता धमीजा

    कोई अच्छी किताब पढ़ते हुए,

    बनने लगती है जब गहन रुचि

    आदत होने लग जाती है फिर

    उसे पढ़ने की,

    और समय निकाल, पढ़े जाने की।

    मगर वो किताब तभी हो जाती है ख़त्म!

    ठीक ऐसे ही किसी किताब-सा था

    मेरे लिया तुम्हारा प्रेम

    जितना तुम्हें साथ पाती

    उतने ही साथ की ख़्वाहिश बढ़ती जाती।

    मगर फिर एक दिन

    रिश्ते के साथ ही

    वो साथ ख़त्म हो गया!

    किताब की अंतिम पंक्ति पढ़ने तक

    भारी-सा होने लग जाता है मन

    जबकि अंतिम पन्ना पलटने पर

    एहसास होने लगता है, साथ छूटने का

    पर फिर भी पन्ने को पढ़े जाने में

    उत्साह नहीं होता कम।

    ठीक ऐसे ही आख़िरी बार

    पलट कर तुम्हे देखने में

    एक हूक-सी भर आई थी।

    वो दर्द जिसका एहसास

    आख़िरी मुलाक़ात के वक़्त नहीं होता

    आख़िर हृदय अपने प्रिय इकाई संग

    हर लम्हे को जीना चाहता है, भरपूर।

    और फिर वो पसंदीदा किताब

    जब रख दी जाती है सजाकर

    बाकी सब किताबों के साथ!

    ऐसे ही रखा है,

    तुम्हारे साथ की यादों को भी

    हृदय में महफ़ूज़, अन्य सब भावों के साथ।

    वो पसंदीदा किताब

    दौबारा पढ़ी तो नहीं जाती!

    मगर हर टूटते क्षण में

    नज़रें दौड़ जाती हैं,

    कुछ पसंदीदा पंक्तियों और हिस्सों पर

    और हृदय पा लेता है,

    उत्साह और उमंग।

    ऐसे ही वो प्रेम,

    नहीं मिलेगा कभी दोबारा

    लेकिन हर कठिनाई के पल में

    देता है प्रेरणा

    और इंगित रहेगा

    अनंत काल तक।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अर्पिता धमीजा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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