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प्रत्यागमन

pratyagaman

गरिमा सिंह

गरिमा सिंह

प्रत्यागमन

गरिमा सिंह

और अधिकगरिमा सिंह

    वह—

    बरसात की तरह आता था

    और तूफ़ान की तरह लौट जाता था

    जब तक मिट्टी गीलेपन को सोखती हुई

    धरती को हरेपन का उपहार देना चाहती थी

    तब तक एक पराया बवंडर—

    मिट्टी को लगभग राख़ बनाता हुआ

    धरती के ताज़े हरेपन को पीलेपन में बदल देता था

    जैसे सपनों पर गाढ़ा स्याह रंग चढ़ गया हो

    सपनों का मुरझाना ख़तरनाक होता है

    सपने दिल की कोख से जन्मतें हैं

    और सपनों का मरना दुनिया का सबसे बड़ा मातम है

    सपनों के मरने का मतलब है—

    दिल की कोख का जन्मों-जन्म तक सूनी रह जाना!

    तुम—

    ख़ुबसूरत सपने की तरह हो

    जो उस सपने की हक़ीक़त है

    तुम्हारा होना महसूसती हैं मेरी पंच ज्ञानेंद्रियाँ

    और मन है निसंग तुम्हारा

    तुम्हें महसूसती हूँ—

    तो गीली मिट्टी का सोंधापन उतर आता है आत्मा पर

    और धरती की हरियाली रंग जाती है दिल को हरा

    तुमसे मिलकर कितनी-कितनी भावनाएँ इस दुनिया में—

    जन्मती हैं और सांस लेती हैं

    और सपनों का पंख थोड़ा और फैलता है

    आसमान के उस छोर तक पहुँचने के लिए

    जहाँ से सूरज की स्वर्णिम किरणें

    धरती को अपने स्पर्श से प्रकाशित कर देना चाहतीं हैं

    यह मोहकता, यह जादू केवल कल्पना में नहीं

    यथार्थ में देखना चाहती हूँ

    इसलिए तुम—

    बसंत की तरह आना

    और हेमंत की तरह लौटना!

    स्रोत :
    • रचनाकार : गरिमा सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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