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प्राणक मोह

pranak moh

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    माङऽ भीख अबै छलि सब दिन

    बुढ़िआ परम बूढ़ि खोँचड़ि सन

    हड्डी सहित सुखा जारनि सन भेल छलैक

    डेढ़ हाथक छलि—

    'बौआ लोकनि दिअऽ किथु दूता'।

    भरल विषाद स्वरेँ कहि बुढ़िआ

    भभा जोरसँ हँसिओ दै छ।

    एक दिनुक घटना देखल

    हम अपना आँखिएँ एकठाँ

    अबितहिँ बुढ़िआकेँ दुआरिपर

    छरपल छौँड़ा पहुँचल लगमे

    छल छौँड़ा महा हँसक्कड़

    पुछलकैक बुढ़िआकेँ जा कऽ–

    'की गै बुढ़िआ! कोना रहइ छेँ?

    बहुतो दिन बितलौ

    नहि अयलेँ कोन कारणे?

    आइ कहाँसँ आबि रहल छेँ?

    निके रहै छेँ किने शरीरेँ?'

    जा बुढ़िआ उत्तर देबा लय मुँह सरिऔलक

    ताबत छौँड़ा फेर पुछलकै--

    कते भेल छौ आइ तोरा मोटरीमे चाउर

    उसिनेटा छौ, की छौ अरबो?

    गूड़ लबै छी हम दू पाइक

    तैओ लोक एहि जीवनसँ

    नहि ने होइछ हताश।

    सतत जीबाक रहै छै इच्छा

    रहै छै बनल सतत नव आश।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 381)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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