Font by Mehr Nastaliq Web

प्राण-वायु की तरह

praan vayu ki tarah

देवेंद्र 'देव'

देवेंद्र 'देव'

प्राण-वायु की तरह

देवेंद्र 'देव'

और अधिकदेवेंद्र 'देव'

    सूर्य की,

    पहली किरण का

    भीगे-भीगे वृक्षों से

    इस तरह—

    खुलकर

    लिपटना,

    बढ़ गया स्नेह इतना।

    संकुचित,

    सड़कें हैं

    बोझिल रास्ते,

    किस वास्ते—

    इनको,

    उपेक्षित कर दिया है?

    रौंदते

    जब भी चले

    पैरों तले—

    उम्मीद का चेहरा

    सिसककर सो गया है।

    शेष है

    संदेश है,

    आदेश है उपदेश है

    बस

    इन्हीं पर गीत लिखना।

    रक्त में,

    सिमटी हुई—

    ज्यों प्राण-वायु की तरह है

    ज़िंदगी में अर्थ कह दूँ

    व्यर्थ लेकिन किस तरह?

    उदर

    लाया सड़क तक

    उमर

    नीचे महल के

    आँख-मींचे

    क्या नहीं देखे हैं हम।

    विद्रोह कर दूँ?

    क्या करूँ—

    किससे कहूँ,

    सहन

    अब मुझसे नहीं होता—

    सिसकना।

    बढ़ गया स्नेह इतना।

    स्रोत :
    • पुस्तक : संधियाँ लेकर (पृष्ठ 54)
    • रचनाकार : देवेंद्र 'देव'
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 1998

    संबंधित विषय

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY