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पिता की बेटियाँ

pita ki betiyan

भारती पुरोहित 'कागदांश'

भारती पुरोहित 'कागदांश'

पिता की बेटियाँ

भारती पुरोहित 'कागदांश'

और अधिकभारती पुरोहित 'कागदांश'

    जीवन को नया मोड़ देती हैं,

    अनजान रिश्ते जोड़ लेती हैं।

    पिता का संस्कार साथ लेकर,

    पिता का ही घर छोड़ देती हैं।

    जिस आँगन में परवरिश पाई,

    जहाँ सपनों को पंख दे पाई,

    उसी घर की हर सीख समेटे,

    नए घर की माला में मोती जोड़ देती हैं।

    जो सपने पिता के आँगन में देखे थे,

    उनमें से कुछ सपने वहीं छोड़ देती हैं।

    फिर भी हर नई ज़िम्मेदारी को

    मुस्कुराकर अपनी आदत में जोड़ लेती हैं।

    बंधन जोड़ती हैं एक और घर से,

    पर डोर पिता से कभी नहीं तोड़ती

    छूट जाता है बस हाथ पिता का,

    यादों की पकड़ मगर नहीं छोड़ती।

    वो ज़िद, वो नखरे, वो मासूम बातें

    जो पिता के साए में करती थीं

    उन्हें समय की तहों में रखकर भी,

    पिता का विश्वास साथ रखती हैं

    छूट जाते हैं वो आँगन

    वो खेल, वो खिलौने

    वो चौखट, वो गलियाँ

    और बचपन के सारे बिछौने।

    लोग कहते हैं,

    बेटियों का स्वभाव ही छोड़ जाना है,

    पर सच तो यह है

    वे घर छोड़ती हैं, पिता नहीं।

    हर क़दम पर, हर साँस में

    हर निर्णय की छाँव में

    वे जीवन भर थामे रखती हैं

    अपने पिता का साथ।

    घर बदल जाता है बेटियों का

    लेकिन उनके भीतर बसा

    पिता का घर कभी नहीं बदलता।

    स्रोत :
    • रचनाकार : भारती पुरोहित 'कागदांश'
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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