पिछली रात के स्वर

श्रीराम वर्मा

पिछली रात के स्वर

श्रीराम वर्मा

और अधिकश्रीराम वर्मा

    रुको हे राम,

    झूठी मर्यादा की खाल ओढ़े सीतापति,

    रुको।

    हाँफते हुए जन-सिंधु के दीन स्कंध-शेष पर

    आसीन

    शांताकार, कमलनयन

    हो तुम।

    मैं तुम्हें पहचानता हूँ।

    रुको,

    अपार अंधकार के काले झंडे लिए,

    देखो,—

    यह कौन है—विरोध करता तुम्हारा;

    सम्मुख तुम्हारे ही—

    अकेला, अनवद्य, रुद्र, प्रलयंकर

    सागर-गर्जन का द-हाड़-ता हुआ

    ट्ट हा स?

    नहीं,

    पिता लव-कुश के,

    नहीं।

    मैं हूँ लौहपाथर चक्रदबी

    बहती सभ्यता से ऊपर उठ आया

    एक कीड़ा :

    मुक्ति दी है मुझे शायद अनजाने

    तरंग ने—

    पिता लव-कुश के,

    तुमने नहीं।

    जवाब दो :

    हज़ारों आँखों से बेध गया इंद्र

    माता अहल्या को।

    दे दी अपवित्रता अदेय अपने ‘बज्र' हृदय से।

    कौन सा दंड दिया उसे—उस कायर इंद्र को?...

    क्या किया उस चंद्रमा का?

    जो अरुणचूड़-स्वरों में प्रभात का

    करा गया भान पिता गौतम को।

    और दे गया एक शाप-मुद्रा प्रस्तरीया—

    उन्हें। मुझे। माता अहल्या को!

    कौन-सा दंड दिया?

    धीरे-वीर, न्याय-निकर,

    जवाब दो,

    कौन-सा दंड दिया तुमने?

    उल्टे इंद्र की प्रतिकृति बना ली दुहरी :

    अपने ऊपर तारोंजड़े आकाश

    और मणियों सजे नीले जलधि से।

    चंद्रमा को भी भेंट की

    कालिमा अपनी

    प्रसन्न हो।

    हे राम,

    माता अहल्या को मुक्त किया तुमने

    पैरों से रौंदकर?

    क्या वह पुल थी?—

    जिससे घरघराती नदी

    मर्यादा की

    पार कर सके थे तुम!

    छू सकते थे कमल-करों से भी

    उसे :

    उस पत्थरित गुमटी को।

    मुक्ति के द्वार थे

    तुम्हारे वे हाथ भी।

    क्या वह असन-वसन-विरक्त

    जड़ दिशा भर थी?

    —प्राणवंत सत्ता नहीं?

    क्या वह केवल भक्तिलीन

    मात्र दासी थी?

    —अंतर्वत्नी की दुर्दम धारणा नहीं?

    मैं हूँ

    लव-कुश की परंपरा में जीवित अहल्यापुत्र!

    —बजबजाते तुम्हारे मर्यादित प्रवाह से उबरा हुआ कीड़ा।

    सीतापति,

    झूठे शील की खाल ओढ़े राम,

    गल गए बजबजाते प्रवाह में जो,

    कंधे दो, हाथ दो, पैर दो,

    लय दो, संदर्भ दो अच्युत,

    पूरे मनुष्य का समग्र साकल्य दो,

    गति दो बँधे क्षीरसागर को,

    मुक्ति दो दीन-स्कंध-शेष को।

    उतरो ज़मीन पर

    मुकुट की तरह स्वीकारो।

    ‘स्वयंप्रभा समुज्ज्वला' के

    पुष्पक दो।

    रेंगते-सहते कीड़ा भी

    क्षितिज फोड़ बन जाता

    सुदर्शनचक्र

    जब बेहाथ विष्णु

    धृतराष्ट्र में बदल जाता,

    च्युत होता।

    अच्युत

    उतरो ज़मीन पर।

    मुक्ति दो।

    गति दो।

    संदर्भ दो

    स्वीकारो

    प्रात:-प्रभा

    साथ-साथ

    आओ ज़मीन पर

    अँधेरे में सुई की तरह

    ढूँढ़कर भी दिव्य-चक्षु समवर्ती,

    कैसे कहते हो नांदी स्वर्ग-नाटक की

    मुझे मेरे सूत्रधार,

    कैसे मंगल्य शंख फूँक दूँ

    इंद्र के सदन में,

    कानों ने सुने नहीं मंगल वर्ण तक

    प्रतीक्षा में पुरइन हुए महाशमन,

    मंगलवाणियाँ कंठ के वलय होकर

    झूल गईं झुर्रियाँ

    बिखेर दूँ कैसे शची के आँगन में

    अपने इंदु की रश्मियाँ!

    उजाले पाख तो आए ही नहीं महाकाल,

    कमल पर अपने ब्रह्मा को आसन दूँ

    किस तरह

    कमल वह

    असूर्यम्पश्य लिखा

    आज तक खिला नहीं।

    भसींड़ भर बची हूँ कूँथी हुई।

    अंतक, तुम कहते हो, भर दें तड़ाग देव-हृदयों के

    अपने कैरव-कदंब से कैसे!

    कैसे कहते हो!—

    अमर कर दूँ अपने चक्रवाकों से

    प्यार की पिपासा को!

    सूखे सरोवर पर मिटती हुई संध्या सिमट आई है!

    कैसे कहते हो परेतराज,

    विशेषणों के बोझ से

    संज्ञाहत पड़ी हुई कब से दबी

    सह नहीं पाती अब

    व्यंजना पर कसे हुए

    इतने अलंकार-भार!—

    कृतांत, स्वर पारावत हुए।

    मैं नहीं नांदी।

    नहीं हूँ नारदीया वल्लकी।

    पदक्रम की परंपरा भी नहीं मैं

    चित्र-विचित्र

    उच्चैःश्रवस् की।

    छुओ मत मुझे। हटा लो।

    हिलते वीणागिरी पिंगल माला-से शीतल हाथ

    लौट जाओ यमराज,

    लौट जाओ।

    मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगी।

    उर्वशियाँ-मेनकाएँ सब मुझे देख

    नृत्य भूल जाएँगी।

    ताल-गति-लय जीवन में कहाँ!

    कहाँ मेरे जीवन में—

    नित्य ही समुद्र-मंथन यहाँ!

    कौन-सा पुण्य किया,

    अमृत पिया कौन-सा मैंने!

    मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगी।

    मेरे एक आँसू में ऐरावत डूब जाएगा।

    इंद्र की हज़ार-हज़ार आँखें बुझ जाएँगी।

    छिन जाएगा शची का शारदीय हास।

    स्वर्ग प्रलय-अँधियारा बन जाएगा।

    मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगी।

    ब्रह्मर्षि, नहीं हूँ मैं आत्मा नचिकेता की, ही सावित्री।

    क्या करूँगी ब्रह्मविद्या, श्रेय-प्रेय, हिरण्यवह्नि—

    जीवन कहीं इनसे भी आगे, है बड़ा है, बृहत्तर है।

    क्यों जाऊँ और लौट आऊँ।

    क्यों जाऊँ और अधर में लटकी रहूँ।

    मेरे सत्यवान को रहने दो मेरे साथ समवर्ती,

    ढाक के स्फुलिंग-द्वार कहीं और होंगे।

    अग्निमय जीवन यहाँ पकता है।

    गुंबदों बीच मैं जलती शिखा नहीं,

    रसोई की आँच हूँ।

    नित्य है पावक-परीक्षा यहाँ।

    समुद्र-मंथन यहाँ नित्य होता है।

    मैं अपने राम की छाया नहीं,

    धीरज हूँ पृथ्वी का।

    पितृपति, कौन-सा ऋतुराज है,

    जिसके आते-आते यवांकुर

    वसंतकम्र होता है पक कर वानीरवर्ण।

    किन नयनों में शरद खिलता और उड़ता।

    बनता हे उत्तरोत्तर उज्ज्वलता!

    कौन-सी है उदीषा-लोल पुष्करिणी,

    जिसमें चुलबुल मछलियों के

    होते हैं तरल चमक भरे महारास!

    सह नहीं पाती अब

    व्यंजना पर कसी हुई

    ऐसी विडंबना!

    विशेषणों के बोझ दबी

    संज्ञाहत

    मैं राधा, मैं रुक्मिणी, मैं शकुंतला।

    पंचकन्याओं की स्वीकृत कामना लिए

    मैं हूँ केवल एक वृत्त में घूमती।

    घर के भीतर ‘शंघाई की अँगड़ाई—’

    यमुनभाई,

    पीतोदक, जग्धतृण, निरिंद्रिय गऊ एक,

    देखो, अपने सूक्ष्म तन, उदारचेता ऋत्विज के लिए

    अब तक बची हुई—

    उड़ेलती स्नेह-बूँदें

    नन्हीं इस बाती को

    धुआँठ कर भी!

    कैंची से भुजाओं फँसा आँचल काट

    भागने वाली स्वर्ग की परी मैं नहीं।

    अपने सुदामा की महल-अटारी मैं।

    फूटी कठौती में परोसती चारों पदारथ मैं।

    तोते की छाती-से कोमल महाकाल,

    पिंजरे में नहीं रहूँगी

    मैं वन जाऊँगी,

    पर स्वर्ग नहीं जाऊँगी।

    ‘सूली ऊपर सेज' बिछाकर

    सो जाऊँगी,

    पर स्वर्ग नहीं जाऊँगी।

    सुनो, तुम चले जाओ।

    मैं खिंची इस रेखा के आगे नहीं जाऊँगी।

    धर्मराज, नहीं डरती तुम्हारे बूढ़े भूरे चंद्रमा ज्यों

    भैंसे से,

    छलना से डरती हूँ।

    जुआ-छल से घबराती।

    सहने से नहीं।

    श्राद्धदेव समवर्ती, स्वर्ग क्या है

    साड़ियों के बढ़ते हुए खिंचते

    रंगारंग बहते मिटते

    बादलों का भुरभुरा एकांत

    नंगे पानी में

    स्वर्ग क्या है

    इसके सिवा।

    मेरी लाज रख लो मेरे हरि

    दंडधर!

    तुम कहते हो, बर्फ़ हो गई हूँ।

    तो क्या, गल जाऊँगी।

    तुम कहते, मैं टहनी हूँ।

    सुलग जाऊँगी।

    “तुम कहते

    ‘उत्तर-वेला यह’

    वैवस्वत, तुम चले आओ।

    मुझे मेरे सत्यवान के साथ रहने दो।

    अलविदा देवताओ, अलविदा!

    देख ली इंद्रसभा :

    स्थगित हैं मुद्राएँ।

    सिर्फ़ संवेदन झनझनाते हैं,

    आत्मा यहाँ कहाँ है?

    संवदेन के पुतलो,

    तुम्हारे स्वर्ग के

    देख लिए प्रिंट

    भीगे ऐश्वर्य के।

    कैसा है स्वर्ग यह

    एक-एक थिरकन में

    दिखती हैं नरक की भारी थकानें!

    कैसी है मर्मर-ध्वनि

    नंदन-कानन की।

    पत्ते-पत्ते की आवाज़ यह कैसी है!

    दबी-दबी

    कितनी-कितनी, किसकी-किसकी

    रुँधी हुई सिसकियाँ

    हवाओं में

    गूँजती हैं मंद-मंद

    आती हुई पत्ते-पत्ते से।

    भोग के इतने बीहड़ जुगाड़ हेतु

    कितने पुरातत्त्व हुए!

    पाथर पर रह गए

    लकीर भर कितने अनात्म हो

    कितने रेंगते।

    हिसाब दो।

    कल्पवृक्ष यह तुम्हारा

    हरहराता है किस तरह।

    कितने समुद्रों के कितने

    सुगंधित बादलों की खाद कितनी

    इसकी पाताल तक गई

    जड़ों में डाली गई,

    जवाब दो देवताओ!

    कामधेनु, सिर्फ़ जो तुम्हारी है,

    जुगाली जब करती है,

    इस अनवरत महोत्सव के पीछे

    चुपचाप चक्कियों की घरघराहटें

    हरसिंगार-सी टपकती हैं;

    सफ़ेद हो गया ख़ून झाग बनकर रह जाता।

    चुप्पी में छिपे कितने-कितने-कितने दर्द के एहसास।

    स्वर्ग में तुम्हारे

    नरक की कथा

    इस तरह निरंतर चलती है।

    नृत्य यह बंद कर दो अप्सराओ,

    एक बच्चा कहीं नूपुर-सा छिटका पड़ा

    पसीने की बूँद-सा ठिठका, खिंचा

    ‘दूर पेंसिल-रेख-सा'

    धीरे-धीरे धुँधलाता,

    हवा पर चलती नाड़ी-सा स्वर उसका

    यहाँ तक आता।

    बंद कर दो नृत्य अप्सराओ,

    कहीं किसी रामगिरि पर

    अधमरा एक यक्ष

    पानी तक के लिए तड़पता।

    कितना अनात्मीय हो गया है

    तुम्हारा स्वर्ग, जिसमें

    कहीं मूल के लिए ललक भरी गोद है,

    कहीं मर्म को सहलाती हुई थाप।

    मरा हुआ मर्म

    संवेदन के ताँत बन

    बजता है बार-बार।

    यांत्रिक ऐश्वर्य में उन्मादी गति है

    सिर्फ़, स्थितियाँ नियंत्रित नहीं।

    लपलपाती लालसाएँ

    आकाश घेरे जिह्वाएँ

    कटघरे बनाती हुई।

    यह कैसा विस्तार है,

    जिसमें इतनी सीमाएँ हैं।

    ऊपर हवाएँ हैं बेशुमार,

    नीचे साँसें घुटती हैं बार-बार—

    गद्दी से गद्दी तक तुम्हारी गति।

    पैर तुम्हारे ज़मीन पर नहीं पड़ते।

    तुम अमर हो, कभी मर नहीं सकते।

    कैसी यह नदी है तुम्हारी,

    जहाँ जर्जर परिंदे हैं।

    अमृत-जल एक बार पी लिया जिसने,

    मर नहीं सकता कभी।

    उड़ नहीं सकते ये।

    गा नहीं सकते ये।

    सिर्फ़ पंख फड़फड़ाते

    गिरते हैं बार-बार

    अफाट

    सुख-भोग के किनारे।

    कितने अधूरे हो देवताओ!

    स्वर्गकामियो, तनिक नरकार्थी बनो।

    पूरे हो जाओगे।

    तुम्हारी बनावट में खोट है।

    चोट खाए कितने तुमसे ओट हैं।

    ऐश्वर्य को गंध की तरह बँटने दो।

    अँटने दो निरभ्र आलोक।

    घेरो मत दीवारें।

    स्वर्ग को जीर्ण वस्त्र की तरह उतार फेंको।

    जाग्रत विवेक से नरक की पाट दो खाइयाँ।

    धुरीहीन देवताओ,

    असंतुलन मत बढ़ाओ।

    मुझे मत कहो ऋषि मंत्रमुग्ध,

    नहीं हूँ मैं बरी सौरचक्र से।

    मुक्ति दो अपने अधूरे प्रेतों को।

    मनुष्य के सिवा पूरा कुछ भी नहीं।

    अधूरे देवताओ,

    पूरे बनो।

    मनुष्य एक पूरे बनो।

    मनुष्य अपना पूरापन ख़ुद उगाता है।

    पूँजी से चिपटा अमरता तक जीता नहीं

    पूँजी के लिए

    स्वर्ग वह रचता नहीं।

    बाँटता है जीने और होने के लिए

    जीना और होना

    और मरना तक—

    देख ली इंद्रसभा।

    रंग-रोग़न सब देख लिए।

    अजायबघर से तुम्हारे

    जाता हूँ अपनी बेहतर दुनिया में।

    अलविदा देवताओ, अलविदा—

    स्रोत :
    • पुस्तक : गली का परिवेश (पृष्ठ 88)
    • रचनाकार : श्रीराम वर्मा
    • प्रकाशन : पीतांबर प्रकाशन
    • संस्करण : 2000

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