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फूलमनी

phulamni

सुशील कुमार

सुशील कुमार

फूलमनी

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    कितनी भोली

    और अनजान हो तुम फूलमनी

    इस धरती पर,

    वायुयान को

    एक चील समझती हो

    और रेलगाड़ी पर

    बैठने के सपने देखती हो

    सूरज रोज़

    गुम्मापहाड़* के पीछे से उगता है

    और बाँसलोई* नदी की

    कोख़ में समा जाता है

    हर साँझ तुम्हारे लिए

    तुम्हारे लिए

    पृथ्वी जब से बनी,

    कच्छप अवतार के

    पीठ पर या शेषनाग के

    फन पर ठहरी हुई है

    दुमका शहर अब भी

    तुम्हारी पहुँच से

    बहुत दूर है फूलमनी

    इतना भी नहीं जानती कि

    तुम्हारे गाँव से

    बहुत ही बड़ी होगी यह दुनिया!

    बस नदी पार...

    जंगल से क्षितिज तक

    जितनी देखती हो फैली हुई धरती

    जो आसमान से जा मिलती है

    वहीं तक समझती हो,

    है यह दुनिया

    जिसमें अपने गाँव सरीखे

    और कई गाँव होंगे

    रतजगी कर नित्य

    केंदु-पत्ते के पत्तल

    दतुवन के मुठ्ठे

    बाँस की टोकरियाँ

    बनाती हो

    हर मंगल-सनीचर को

    नदी पार हाट जाती हो

    पूरा गाँव निढ़ाल होता है जब नींद में—

    बहुत भोर में—

    मुर्गा-बाँग से बहुत पहले ही

    उठ-पुठ कर

    जंगल चल देती हो—

    महुआ बीनती हो

    लकड़ी चुनती हो

    घास का बोझा बनाती हो

    मन ही मन

    मगन हो कोई प्रेमगीत गुनगुनाती हो

    और वंदना-माघे परब के आने की

    प्रतीक्षा करती हो

    आएगा सुकल बेसरा गाँव

    असम से कमाकर

    तुम्हारे लिए नई साड़ी

    ब्लाउज के कटपीस

    और रोल-गोल्ड के

    सुंदर-सुंदर हार

    रंग-बिरंगे बाले लेकर

    हाट-बाट से थककर

    जड़ी-बूटी, कंद-मूल-महुआ-दतुवन सब

    बेच-बिकन कर

    दिनभर की थकान के बाद

    नहा-धोकर

    जलखई कर

    जब सज-धजकर

    खाली टोकरी पर हाथ धर

    दलान की सिल पर

    बैठती हो सुसताने

    तो

    रोज साँझ डूबने तक

    अपने पिया के बारे में ही

    चिंतामगन रहती हो—

    —“कि इस बार

    उरिन हो जाएगा तुम्हारा पति

    गाँव के रामनरेश भगत के कर्ज से

    तुम्हारी चाँदी की माँगटीका, हँसूली

    फिर लौटा लेगा तुम्हारा सुकल महाजन से

    तुम्हारी गईया

    फिर वापस गोहाल में पागुर करेगी

    और तुम्हारा छोटका

    जरूर नाम लिखा लेगा इस बार स्कूल में

    फिर जाओगी

    बापू को देखने नदी पार

    पहाड़ के दक्षिण

    बीस कोस पैदल

    अपनी माँ के घर स्वामी संग

    परब के कुछ उपहार लेकर”

    पर सिहर उठता है तुम्हारा मन

    यह सोचकर कि

    कई महीने हो गए नैहर गए हुए—

    पता नहीं

    खाँस-खाँस कर बापू का

    बुरा हाल हो रहा होगा

    माई भी कुहरती होगी

    गोहाल में गाएँ फँसी होगी गोबर से

    और छोटकी पर नज़र गड़ाए होगा

    रामजस सिंह का निठल्ला बेटा कन्हैया

    फूलमनी! देखता हूँ,

    धरती पर तुम

    निष्पाप-निश्छल नारी का प्रकृति-रूप हो

    ममता और प्रेम की घनीभूत पीड़ा हो

    तुम्हारे भीतर प्रेम की अविरल नदी बहती है

    और विरह की अगन जलती है

    सच और सपने की आँख-मिचौनी के बीच

    अपने पति के लौटने की चिर–आशा लिये

    पगडंडियों पर बिछाती हो नित्य पलकें अपनी

    जिनमें ज्वार के पहले की

    सागर सी थमी हुई निस्तब्धता होती है

    पर हर साँझ

    तुम्हारी याद को

    विकल रात में बदल देती है

    अगली सुबह के लिए

    पता नहीं किस दिन

    तुम्हारे अंतस की चढ़ी नदी में

    बाढ़ जाए

    और उसमें तुम्हारे सपनों का घरौंदा बह

    किसी सुनसान टीले के

    ठौर लग जाए!

    * * *

    गुम्मापहाड़* = दुमका का एक पहाड़,

    बाँसलोई*= पाकुड़ और दुमका को विभक्त करती एक नदी।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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