फूलकुमारी
phulakumari
माँ के लिए
आँखों की कोर पर एक हिमनद
अटकी रहती है
जो तुम्हें देखते ही पिघलकर
छलछला उठती है
फूलकुमारी
कभी मैं बच्चा था तुम्हारा
अब तुम बच्ची हो मेरी
डरता हूँ हवा की आहट कहीं तुम्हें जगा न दे!
या कोई आवाज़ तुम्हें न कर दे परेशान
तुम्हारे बाल गाँछते हुए देखता हूँ
जब तुम्हारे झड़ते बाल
सोचता हूँ कितने युग बीत गए
जीवन का कष्ट सहते-सहते
फूलकुमारी तुम पहले-सी नहीं हो सकती
कुछ नहीं हो सकता इस दुनिया में पहले-सा
एक बार बीत जाने के बाद
एक बार बीत जाने के बाद
जी करता है एक बार कस के गले लग जाने का
कितना कुछ खोने के बाद
डरता हूँ फूलकुमारी
कहीं तुम्हें न खो दूँ।
- रचनाकार : रवि यादव
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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