Font by Mehr Nastaliq Web

फिर काहे की दूरियाँ

phir kahe ki duriyan

अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

फिर काहे की दूरियाँ

अनवर सुहैल

और अधिकअनवर सुहैल

    देखकर मुझको तुम्हें याद आती बिरयानी की

    मिलकर मुझसे बातें करते शराब-शबाब से लबरेज़ ग़ज़लों की

    तुम्हारे संवाद में अचानक उर्दू कुछ ज़्यादा जाती

    और अपने उर्दू ज्ञान से प्रभावित करने के लिए

    कहते मुझे जनाब की जगह ‘ख़ुदा-हाफ़िज़’

    जबकि मैं तुम्हारी तरह इसी मिट्टी की उपज हूँ

    उतना ही हिंदी, उतना ही देसी, उतना ही देहाती जितने तुम

    फिर मुझे क्यों देखते हो एक परदेसी की तरह

    मैं कोई एलियन नहीं हूँ भाई

    खान-पान, बरत-त्यौहार, रीत-रिवाज अलग होते हुए भी

    कितने एक से हैं...देखो न,

    बेटियाँ बिदा के वक़्त रोती हैं तुम्हारे यहाँ

    और भर आती हैं आँखें लड़के वालों की भी

    हमारे यहाँ भी तो ऐसा ही होता है भाई

    फिर काहे का अंतर...

    फिर काहे की दूरियाँ...

    स्रोत :
    • पुस्तक : दूसरी हिंदी (पृष्ठ 35)
    • संपादक : निर्मला गर्ग
    • रचनाकार : अनवर सुहैल
    • प्रकाशन : अनन्य प्रकाशन
    • संस्करण : 2017

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY