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पेड़ की पीड़ा

peD ki piDa

तैबा हबीब

तैबा हबीब

पेड़ की पीड़ा

तैबा हबीब

और अधिकतैबा हबीब

    रास्ते आज भी अपनी जगह स्थिर है

    वो पेड़ अब भी वही कालखँडों से खड़े है

    देखते है मुझे मौन दृष्टि से

    देना चाहते हो जैसे मुझे आवाज़

    अगर होते उनके पास शब्द

    पूछते वो मुझसे

    कहाँ गए वो दूसरे दो पैर

    जिनके साथ चलने पर बदल जाता था गणित

    जहाँ एक क़दम चलने पर गूँजता चार पदचापों का संगीत

    जीवित चीज़ों को भी दिखता होगा जीवन

    दिखता होगा उनको होने वाला छल

    वो पैर अब भी वही जाते होगें

    किसी दूसरे दो पैरों के साथ

    अगर होती आवाज़ उन पेड़ों में

    तो पूछ लेती मैं उनसे

    जीवन अब भी वैसा देखता है

    जैसा देखता था मेरे साथ

    अब भी दो क़दम चलने पर होते चार

    जीवित चीज़ों को नहीं मिला पूरा जीवन

    मिलता तो तुम देते आवाज़

    देखते मुझको मेरी आँखों से

    फिर नहीं पूछते कोई सवाल

    प्रेम की पीड़ा हर कोई नहीं देख सकता

    पेड़ों के पास भी होती होगी अपनी मूक पीड़ा

    जड़ों से बंधे पेड़ भी उठाते होगें इसका भार।

    स्रोत :
    • रचनाकार : तैबा हबीब
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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