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पत्थर फेंकने वाला

patthar phenkne vala

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

आन्तुन षोल्यान

आन्तुन षोल्यान

पत्थर फेंकने वाला

आन्तुन षोल्यान

और अधिकआन्तुन षोल्यान

    एक

    भागता हूँ नंगे पैर नदी के किनारे,

    नदी के किनारे जिस पर हज़ारों बगुले,

    भागता हूँ और रुक जाता हूँ और उँगलियों पर खड़ा हो जाता हूँ

    कि देखूँ ऊपर, नीचे किनारे पर,

    हालाँकि सैकड़ों बार पहले भी,

    हालाँकि सैकड़ों बार पहले भी देख चुका हूँ,

    हालाँकि कुछ बदला नहीं है

    जब से फेंकता आया हूँ लंबोतरे पत्थर

    सुंदर और कुशल लंबे हाथों से,

    एक-से पत्थरों से भरे किनारे पर,

    पत्थर काले, गोल, कि मारूँ बगुलों को।

    बादलों को देख ऐसा लगता है कि शरद चुकी है

    और ऐसा ही सदा एक जैसी सुबहों में,

    सदा एक जैसे तट के पत्थरों के सामने,

    हालाँकि मैं दक्ष हूँ और जानता हूँ घुमाना

    हालाँकि मैंने सैकड़ों बार पहले भी

    हालाँकि सैकड़ों बार घुमाए हैं,

    मैं खड़ा हूँ और हिचकिचा रहा हूँ, मैं खड़ा हूँ फेंकता नहीं हूँ,

    हालाँकि शरद है और बगुले चले जाएँगे,

    मैं खड़ा हूँ, फेंकता नहीं हूँ, क्योंकि ढूँढ़ना पड़ेगा,

    फेंकता नहीं हूँ, शायद ढूँढ़ पाऊँ

    एक ही पहला पत्थर जो घातक हो

    इन सभी काले एक-से पत्थरों में,

    फेंकता नहीं हूँ, शायद ढूँढ़ पाऊँ

    उसको, लगे निशाना बगुले के, जिसे मारना है,

    एक बगुले को, जो मेरा है,

    हालाँकि सैकड़ों बार सौगंध खाई है

    कि बिल्कुल नहीं चलूँगा

    कुछेक काल्पनिक विधानों पर।

    दो

    और इस तरह मैं, सबसे अच्छा निशानेबाज़

    सबसे कुशल, अपना काम जानता हूँ,

    मैं जो पहाड़ खड़ा कर सकता हूँ

    मरे हुए, भीगे, लंबोतरे बगुलों का,

    पहन सकता हूँ कोट उनके पंखों का,

    उनके लंबे पंख लगा सकता हूँ

    दरवाज़े के ऊपर पुरानी दीवार पर,

    और इस तरह मैं सबसे अच्छा निशानेबाज़,

    झुकता हूँ हर बार, पत्थर उठा लेता हूँ,

    किनारे के पत्थरों में से कोई भी पत्थर

    और पूरी ताक़त से, अति सुंदर घुमाव से

    अति सुंदर युक्ति से उसे फेंक देता हूँ यों ही कहीं,

    फेंक देता हूँ यों ही कहीं शरत्कालीन आकाश में,

    शरत्कालीन बेरंगी, सूती आकाश,

    जिसमें मैं छेद बनाता हूँ जिनमें से देवदूत मुझको

    सड़कों के गीत सुनाते हैं।

    तीन

    कोई भी पत्थर, फेंक दो, सोचो मत

    कि जब पत्थर हाथ से निकल जाता है

    अपने ही जीवन से बौरा जाता है। कि शक्ति

    अब तुम्हारी नहीं रह जाती :

    इस तरह तुम जाते हो यहाँ से पत्थर लेकर।

    हाथ, कंधे, पीठ, और इस तरह

    शायद तुम हो भी नहीं नदी के तट पर,

    जहाँ झुका हुआ आदमी ढीले हाथों से

    विचारमग्न उठा लेता है कभी-कभी पत्थर,

    हथेली पर तौलता है, देर तक देखता है,

    और फिर काँपते हुए, ध्यान से फेंकता है

    नदी में और फिर आधा सीधा होकर

    ऊपर और नीचे किनारे पर नज़र दौड़ाता है,

    कहीं किसी ने देख तो नहीं लिया उसको,

    हालाँकि कब से कोई नहीं है वहाँ।

    मैं तो पत्थरों के साथ कब का चला गया,

    और बाक़ी सब शायद तरीक़ा है

    कैसे, सामान्यतया, वृद्ध बनते हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 155)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : आन्तुन षोल्यान
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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