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प्रार्थना

pararthna

मधुकर गंगाधर

मधुकर गंगाधर

प्रार्थना

मधुकर गंगाधर

और अधिकमधुकर गंगाधर

    हमर आत्माक सत्य

    आवर्तक व्यूह पड़ल

    मुदा डूबल नहि।

    जिह्वा पर दूधक फोका नहि लगैछ

    देह पर रेंगैत

    बीच्छ चुट्टीक ज्ञान

    बच्चा एखनो घरि रखने अछि।

    जल-भरल आँखिक कोरें

    जल-परीक स्नापित देह

    एखन सुवासित अछि।

    हम जाहि टीलापर ठाढ़ छी

    से बालुक बुर्ज नहि

    हमर एम्हर-ओम्हर

    पतझड़ वसन्तक

    एकपेड़िया बिछल छैक

    हमर तरबासँ दबल

    इतिहासक हल्दिया पराग अछि

    हमर दृष्टि कंकाल

    शून्य अटकल नहि

    कियैक तँ

    स्वगक पतित साधक नहि।

    हे देवता!

    अब अपने बुझि गेल होयबैक!

    हम बिकलांग नहि,

    बलक दुलार

    माताक दुधिया हुलास जनैत छी।

    मुदा हे देवता!

    हे समानान्तर

    हम अपनेकेँ चाहैत छी।

    समानान्तर रेखा

    एक दोसराके सहारा दैत छै।

    अहाँक कुंभकर्णीकेँ

    हमर उन्निद्राक आभास होउक

    अहाँक पाथरक पैर

    हमर मारुती पैरक

    गति माँगथि।

    हमर संघर्षक गीत

    अहाँक श्रवण धारण करथि!

    एहन प्रार्थना अपने ब्रह्मासँ करू

    यैह अपनेसँ हमर प्रार्थना।

    स्रोत :
    • पुस्तक : मैथिलीक नव कविता (पृष्ठ 120)
    • संपादक : रामकृष्ण झा ‘किसुन’
    • रचनाकार : मधुकर गंगाधर
    • प्रकाशन : राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला समिति, सुपौल (बिहार)
    • संस्करण : 1971

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