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पापा और स्वप्न

papa aur svapn

पल्लवी जयराम

पल्लवी जयराम

पापा और स्वप्न

पल्लवी जयराम

और अधिकपल्लवी जयराम

    तुम तो गई हो, सब की तरह

    सबकी तरह रोई

    किलकित-हँसी।

    बाल खुजाए,

    बना बनाया बाल उकस दिया।

    यहाँ बचपन की क्रियाओं की

    पुनरावृति,

    हल्का-पन मानी जाती है।

    मैं चाहता हूँ;

    तुम दोहराती रहो।

    दर'असल बचपन का खो जाना

    सामाजिक समझौते की पुष्टि है।

    मुझे तुम्हारा गिरना भी पसंद है

    क्योंकि, आलंबन-हीन शिशु

    केवल गिरता नहीं,

    फिर से उठता भी है।

    फिर से चलता भी है;

    गिरना और उठना ही

    वास्तविक विकास है।

    मुझे पता है, लोग बच्चों को

    कुछ करने से मना नहीं करते क्योंकि

    वो जानते हैं

    जो मना किया जाता है

    बच्चे वही-वही करते हैं।

    मेरी दुलारी!

    तुम भी, जो-जो मना किया जाए

    वही-वही करना।

    वहीं चेतना के बीज हैं।

    तुमको कसने का प्रयास होगा

    लोग तुमसे, तुमको छीनकर

    तराशने का लोभ देंगे

    तुम नहीं मानना।

    वो तुमको धीरे से अनगढ़ कहेंगे

    तुम मुस्कुरा देना।

    तुम को कुछ स्वीकार से पहले

    अस्वीकार करना चाहिए

    क्योंकि जहाँ नकार नहीं

    वहाँ स्वीकृति

    मुर्दा है।

    तुम्हारा होना

    तुम्हारे बचपन में निहित है

    इसलिए तुमको मैं

    हमेशा नवजात देखना

    चाहता हूँ।

    वही कपोल जो मलीन हो जाएँ

    अनैच्छिक स्पर्श से

    क्रोध प्रकट करने का तेवर।

    अपनी जिद में डटने वाली

    उत्सुकता और उत्साह से

    सब जानने की चाह

    और असंतोष

    से भरी हुई चेतना।

    जबरन किसी के पकड़ने में

    कठोर-प्रतिकार की शक्ति

    यही सब मेरे पास

    तुमको देने के आदर्श हैं।

    याद रखना पापा की ये बात

    “तुम तो गई हो, सब तरह

    लेकिन उपस्थिति दर्ज़ करना।”

    स्रोत :
    • रचनाकार : पल्लवी जयराम
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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