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पानी की तितली

pani ki titli

सत्यव्रत रजक

सत्यव्रत रजक

पानी की तितली

सत्यव्रत रजक

और अधिकसत्यव्रत रजक

    (ऐन फ्रैंक को याद करते हुए)

    तुम पानी की तितली होती

    इस तरह मुरझाकर तो न झरता यह कुमुद का फूल

    एक आदर्श वाक्य की क़सम

    तुम्हारे बिना सारी ऋतुएँ भूखी हो आई हैं

    उनमें आत्मा में गरम हवा इस्पात के कारखाने की तरह चल रही है

    तुम्हारे बिना एक नदी सो गई है

    समूचे रक्त में

    बिछाकर अपना ही शरीर

    फूलों की गंध बहुत मालूम-सी हो चुकी है

    आसमान की छाँव बहुत तीखी हो चुकी है

    क्षितिज एक घायल कूबड़ सा उभर आया

    जिससे टकराकर सूरज सौ भागों में टूट रहा है

    रातों का सारा नीलापन गहरी नींद घुड़कने लगा

    चाँद पर परेबों ने बैठने से मना कर दिया

    किसी मौसम विज्ञानी की मृत्यु का शोक जता रही हैं दिशाएँ

    सब कुछ टूटे काँच की तरह चुभ रहा है नाखून में

    तुम्हारी समस्त यादें

    एक लकड़हारे के कंधे पर निशान बनकर लौट आई हैं

    नष्ट हुई आत्मा ने भी याद किया

    और जीवितों के लिए बची हुई उम्र थीं तुम

    जीवन के काव्य ने भी तुम्हें पुकारा

    मृत्यु का देवता भी गढ़ता रहा मिथक

    और तो और समय भी अब और बूढ़ा हो चला है

    घुटनों पर टेकने लगता है बदन

    कभी-कभी तो उसकी एड़ियों में बुखार उतर आता है

    बग़ीचे में गुमा दी था तुमने खेल-खेल में जिसे

    समय अब भी ढूँढ रहा है वह घड़ी

    देखो वह घड़ी अब भी पड़ी है वहीं

    चमक रही है दूर से ही दिख रही है वहाँ मैदान हो चला है

    लेकिन समय उसे बग़ीचे में ही ढूँढ रहा है

    तुम आओ वह घड़ी उठाकर दो

    शायद बग़ीचा मिल जाए उसे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सत्यव्रत रजक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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