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पलायन

palayan

अनुवाद : शिवम तोमर

केकी एन. दारूवाला

और अधिककेकी एन. दारूवाला

    पलायन हमेशा मुश्किल होते हैं

    किसी भी सूखे या महामारी

    या ख़ुद सन् सैंतालीस से पूछ लीजिए

    चाहे तो अभिलेखों में देख लीजिए

    अगर पलायन होते

    तो क्या चिंतन-मनन के लिए पर्याप्त इतिहास होता?

    समय में पीछे जाना भी

    उतना ही मुश्किल होता है

    जो अब भी सरगोधा, झेलम और मियाँवाली के

    चक्कर लगाया करते हैं

    पूछिए उन लोगों से

    कि पुरानी ईंटों में से झाँकते अजनबी लोग

    कैसे बा-मुरव्वत होकर कहते हैं :

    सर, यह अब भी आपका ही घर है!

    जब आप उस समय के बारे में सोचते हैं

    जिसे अब समय कहना ठीक नहीं

    (क्यूँकि वह पत्थर की तरह

    ठोस और अपरिवर्तनीय है,

    उसमें जीवन की नब्ज़ नहीं है)

    मन विषादग्रस्त हो जाता है

    बिल्कुल सावन की उन घटाओं की तरह

    जो बिना बारिश के आकाश में छायी रहती हैं

    माँ पूछा करती थी :

    क्या मुझे नानी याद हैं?

    कि कैसे मैं रसोई के चक्कर लगाया करता था

    कि कैसे मैं नानी के हाथों सिंके पकौड़ों को

    प्लेट में ठंडाने का समय दिए बिना ही

    उठाकर भाग जाया करता था

    क्या मुझे नानी बिल्कुल याद नहीं हैं?

    मेरी स्मृति की आवेगहीनता देखकर

    माँ का उतरा हुआ चेहरा और उतर जाता है

    अब मेरे सपनों में आकर

    कोई मुझसे सवाल करता है :

    क्या मुझे माँ याद है?

    मुझे समझ नहीं आता

    इस सवाल का सामना कैसे करूँ

    वर्षों के बीच पलायन करना भी

    उतना ही मुश्किल होता है

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : केकी एन. दारूवाला

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