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पहला गुलमोहर

pahla gulmohar

रिदम राही

रिदम राही

पहला गुलमोहर

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    आज सुबह पहली बार खिला गुलमोहर

    ठीक वैसे जैसे पहली बार तुम मिली

    चटक लाल-नारंगी फूलों की चादर ओढ़े

    गुलमोहर-सी

    कहते हैं, गुलमोहर स्वर्ग का फूल है

    तो तुम भी तो मेरे दिल का स्वर्ग हो

    अप्रैल के महीने में

    लंबे इंतज़ार का खिला हुआ पुष्प

    वह पुष्प जो कृष्ण के श्रृंगार का

    कृष्ण चूड़ है

    छत्र, घनी छाया और फैलाव में मशहूर है

    तुम्हारा मिलना भी तो छाया ही है

    शीतल छाया

    जैसे मेरी भावनाओं के पेंटिंग ब्रश से

    बनी हुई तस्वीर

    गुलमोहर का खिलना और तुम्हारा मिलना

    उसका सजीव रूप

    हाँ, तुम्हारा रंग वैसा ही है

    एक पंखुड़ी पीली, सफ़ेद धारियों की लिए

    मेरे अंतर्मन में सजी

    तुम्हारे नाम की क्यारियों-सी

    अब आते-जाते धूप कहाँ लगती है

    तुम्हारा मेरे जीवन में गुलमोहर हो जाना

    गर्मी का बसंत जो है

    सदाबहार हो तुम, ऐसी गुलमोहर

    यूं एक नया नाम तुम्हारा—गुलमोहर

    वो पहली बार खिला जो मेरे घर के द्वारे पर

    उसमें आज तुम हो, छवि तुम्हारी

    अपने भरे हुए स्नेह के रंगों में ऐसे ही रहोगी तुम

    गुलमोहर की पंखुड़ियों में

    उसकी कोमलता में, उसके रंग में

    केवल इस साल के जून तक नहीं

    जीवनपर्यंत

    ठहरे हुए अंतर्मन का सुकून बनकर

    मेरे जेहन के स्वर्ग का फूल बनकर

    वह जो आज खिला है मेरे पास

    वो एक कभी ना मुरझाने वाला

    गुलमोहर का फूल बनकर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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