सिंहक त्रास महावनमे हरिणीक समान डरायलि
जननिक कोड़ासँ हम छहलल छी
हम खसब तँ काल शिलाधरि दड़कि जयतैक।
हम कोनो सौर-मण्डलक सदस्य नहि से यथार्थ,
तेँ ई नहि हो जे केन्द्रच्युत नक्षत्रक पीड़ा नहि बुझिऐक
हमहूँ छी घैलक गंगाजल।
बान्हि बल्बकेर भीतर हमरा
जखन मिझाबी, जखन जराबी खुशी अहाँकेर
तेँ ई नहि हो जे कोनो महादिन, महालग्नमे धधकि उठी नहि
युग-युग अस्वीकार करथु कुन्ती से संभव,
मुदा सूर्य पूत्रे हमहूँ छी।
साक्षी अछि इतिहास ताप माटिमे अबिते मर्यादाकेर जमल चीछकेँ भाफ बना कऽ उड़ा दैत छैक
काँचक छोट-छोट शीत कक्षमे
बाँटल जट्ठर सम्बन्धक लासमे
पलटि अबैत छैक गरमी।
नहि बुझिऐक से ककर साध्य जे टुटितो छैक इतिहास
खंड परमाणुओँक होइत छैक
आ, धरतीकेर चूर-खाँच सभ छिटकि जाइत छैक
मिझा जाइत छैक सूर्य
प्रभंजन उनटि जाइत छैक
आ एहनेमे जखन-जखन हम
फूकि-फूकि कऽ पुनः पजारब सूर्य
हमर पीठमे रेजी चक्कू भोंकल जायत
तेँ ई नहि हो जे सेतुबन्धसँ घूमि जाइत हम
हमरा प्राणक वैदेही ओहि पार कनैत छथि।
बौक बजैत अछि तेँ
बहीरकेँ सुनऽ पड़त छैक
मुदा आत्म-परिचित परिचितमे हरा जाइत अछि
अज्ञातवास होइक नियति शब्दबेधीक,
वेश, तेँ ई नहि हो जे व्याप्ति हमर जन्मान्धक सन्तति
भरल सभामे बान्हि लेअय
अन्ततः हमहूँ तँ निस्सीम, पूर्ण सत्येक ऊर्जा छी।
- संपादक : बालमुकुन्द
- रचनाकार : धूमकेतु
- प्रकाशन : ई-मिथिला
- संस्करण : 2018
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