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निस्वार्थ प्रेम

nisvarth prem

मनीषा

मनीषा

निस्वार्थ प्रेम

मनीषा

और अधिकमनीषा

    तेरा मेरी ज़िंदगी में आना,

    और मिश्री की तरह घुल जाना।

    तुझसे मिली जो मिठास

    वो मिठास...मिठास प्रेम हैं॥

    यूँ तो खो गया था वजूद मेरा

    इन ज़िम्मेदारियों के चलते,

    तेरे आने से जो मुझेमें जगी मैं की आस।

    वो आस...वो आस प्रेम हैं॥

    तेरे मेरे बीच की कुछ

    उलझी सुलझी बातें

    कुछ गाएँ साथ नग्मे

    और अलाव में सर्द हाथों को सेंकते रातें।

    उन सर्द रातों की कुछ बिखरी यादे

    से महकती मेरी हर श्वास प्रेम हैं,

    वो हर श्वास...प्रेम हैं॥

    तेरा मुझे खोने का डर

    और मेरा तुझे ना पाने का ग़म

    सब कुछ जान कर भी

    कुछ कह पाने का

    कुछ कर पाने की बेबसी

    बस एक-दूजे को देखकर

    जो ये आँखों हो जाती थी नम

    उन नमी आँखों के पीछे

    छिपे आँसुओं की आह

    वो आह...वोआह प्रेम हैं॥

    हाँ! मैं आज भी ओढ़ के घूमती हूँ तुझे॥

    बस! औरों की भलाई थी।

    हमें ख़ुद को छुपाना॥

    पर तेरा होकर भी तुझे पाया

    और मेरे दूर जानें से तेरा टूट जाना

    हमनें जो किया राधा कृष्ण-सा भाव

    वो भाव...वो भाव निस्वार्थ प्रेम हैं॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : मनीषा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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