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निस्तब्ध

nistabdh

धूमकेतु

धूमकेतु

निस्तब्ध

धूमकेतु

और अधिकधूमकेतु

    गतानल ठोरपर फिफड़ी...!

    फाटल आँखिक लालीक भीतर...!

    भयविद्ध चित्त कुटिल हिंसावृत्ति...!

    शस्त्र वा पाखंड टासँ बातकेँ झँपबाक उन्माद!

    असहमतिमे उठल सभ हाथपर झहरैत बुलेट...!

    सत्ता त्रस्त, लोक आशंकित

    भक्षक चौंकल, भक्ष्य चेहायल

    बोधिसत्वक आँखिमे घुमड़ैत प्रतिहिंसा

    श्वासमे सीताक विश्वासघातक गंध।

    सूर्यक किरणमे अजनबीपन

    चान पियरायल संमन्धक दंशसँ

    सहमल क्षितिजपर ठाढ़ झंझावात

    अधरमे टांगल निरर्थक मूल्य संवाद।

    आगतक पहचान नहि, ने अनागतक भान

    निर्वात खाली शून्यमे औनाइत

    धरतीक तुमुख कोलाहल।

    स्रोत :
    • पुस्तक : मैथिलीक नव कविता (पृष्ठ 8)
    • संपादक : राजमोहन झा
    • रचनाकार : धूमकेतु
    • प्रकाशन : आरम्भ
    • संस्करण : 1996

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