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नौतनवाँ रेलवे स्टेशन पर उतरते ही

nautanavaan relave steshan par utarate hee

ठुसम-ठुस्स-खचा-खच्च भरी इंटरसिटी

घूमते-घामते पहुँचा ही देती है गोरखपुर होते हुए

महाराजगंज के नौतनवाँ स्टेशन

बहुत सारी विविधता एक साथ दिख पड़ती है यहाँ

पाली भोजपुरी हिंदी और कई नस्ल-रूप-रंग

आख़िरी स्टेशन होता है नौतनवाँ

जहाँ पर नेपाल सबसे पहले दिखाई देने लगता है

दवाई-दारू के लिए जुगत करते

पड़ोसी धरम निभाते भोले-भाले आम चेहरे

गले में लाल मोतियों की झालर-हार लटकाए नेपाली विवाहिताएँ

भारत में नेपाल का मँहगा रुपया चलाने की कोशिश

सबसे पहले इलाज़ के रूप में करती हैं

सब जगह ग़रीबी की एक ही लाचार सूरत है दुनिया में

भारत-नेपाल बॉर्डर पर बसे सुनौली गाँव में

जल्दी पसर जाती है रात

खेत खलियान में सियार कुत्ता हुआँ-हुआँ बकैती बाचने लगते

भारत-नेपाल मैत्री संबंध के बारे में।

बहुत आसानी से दुख-सुख सीमा लाँघकर‌

चले आते हैं एक-दूसरे के देश में

जैसे चरवाहों की भेड़ बकरियाँ घूम आती हैं हरबार

अनायास अनजाने में ही विदेश ,

मेहनत-मजूरी भी सीमा लाँघ आती है और बारात भी

इस तरह रोटी-बेटी का संबंध पढ़ पाते हैं

भारत-नेपाल मैत्रेयी के राजनीति शिक्षा के विद्यार्थी

जैसे द्रविड़ और पूर्वोत्तर को सर्टिफिकेट बाँटते हैं हम

नौतनवाँ रेलवे स्टेशन पर उतरने पर

आप नहीं बता पाएँगे किसी का चेहरा देखकर

जाति धर्म नस्ल या नागरिकता

यहाँ सबके चेहरे मज़बूरी के साँचे में ढले होते हैं

और आँखों में दिहाड़ी की एक ज़िंदा चमक होती है।

स्रोत :
  • रचनाकार : ketan yaadav
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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