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नौका

nauka

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

वन की सुंदरी, तुम क्या होतीं

—सब यों भरी घनी बरौनियों से—

बिना ध्वनि-नीड़ों के, पंछियों के बसेरों के

जहाँ गीत उड़ते जहाँ पखेरू उत्सव मनाते?

ओह, किस प्रकार मर रही हो! पर तुम्हारी मृत्यु

ये जन्म ले रही सुंदरी फिर से :

मानवी चहल-पहल का छत्ता उभर आया यहाँ

कि दे दे तुम्हें रूप नए जीवन का।

जब तक सागर उसे लेता आलिंगन में,

कर्मशील जनगण सब तट पर इकट्ठे होते,

देखते अनूठी—कृति अपने हाथों की

यहाँ चोंच, यहाँ पृष्ठ, ये नितंब नौका के।

सागर से सदा के लिए इस तरह बँध जाती

कि उसी के साथ अंत तक जीवन बिताती।

मातृ-बंदरगाहों से विश्व में जाती

लिए हुए कामना विदेशों की नगरों की।

और जब जीवंत गोदी से निकलती

—इकट्ठी जहाँ लालसाएँ सारे संसारों की—

वस्तुओं तथा वन की ऊँचाइयों से विभूषित

जिन्हें अब मस्तूल सागरों पर ले जाता

—फिर से पंछी अथक उसका साथ देते

फिर से पंछी उसे ओझल होने देते!

इधर बिजलियाँ और झोंके उसे झुँझलाते,

उधर कैसी चमकती सागरों पर तैरती,

लहर पर लहर पंक्तियों में सजाती :

ज्यों फ़सल काटती हो या पृष्ठों को पलटती!

स्रोत :
  • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 89)
  • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
  • रचनाकार : व्लादीमीर पोपोविच
  • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
  • संस्करण : 1978

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